रूस में हिंदू अपने धार्मिक ग्रंथ भगवद् गीता को 'चरमपंथी साहित्य' बताए जाने और उसे प्रतिबंधित करने के प्रयासों के खिलाफ कानूनी लड़ाई के लिए एक बार फिर लामबंद होने लगे हैं। सरकारी अभियोजकों ने पिछले साल दिसम्बर में आए फैसले को अदालत में चुनौती दी है।
सरकारी अभियोजक अपनी अपील दायर कर चुके है और न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए छह मार्च की तारीख मुकर्रर की है।
इस्कॉन के महत्वपूर्ण सदस्य साधु प्रिया ने मास्को से फोन पर बताया कि अभियोजकों ने भगवद् गीता पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली अपनी याचिका खारिज हो जाने के बाद तोमस्क की अदालत में अपील की है। अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए छह मार्च की तारीख तय की है।
समाचार एजेंसी 'आरआईए नोवोस्ती' ने तोमस्क क्षेत्र के उप महाभियोजक इवान सेमचिशिन के हवाले से बताया कि तोमस्क क्षेत्र के महाभियोजक वासिली वोइकिन ने अदालत में अपील दायर की है।
वोइकिन ने अपने अपील में इस्कॉन के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांता स्वामी प्रभुपाद द्वारा लिखित 'भगवद् गीता: एज इट इज' लेख में शामिल रूसी अनुवाद को प्रतिबंधित करने की मांग की है।
इवान सेमचिसिन ने कहा, 'अभियोजक ने इस धार्मिक ग्रंथ जो पहले अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुका है, उसके एक अंश के रूसी अनुवाद पर चरमपंथी साहित्य के रूप में प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उन्होंने धर्मग्रंथ के प्रामाणिक पाठ पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं की है।' सेमचिसिन ने कहा कि अभियोजक वोइकिन ने इस वजह से अब ऊपरी अदालत में दावा किया है।
उल्लेखनीय है कि यह मसला दिसम्बर 2011 में प्रकाश में आया था, जिसके बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया। गीता पर प्रतिबंध लगाने की याचिका जून 2011 में दायर की गई थी।
साइबेरिया की अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने से एक दिन पहले भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने भारत में रूसी राजदूत अलेक्जेंडर कदाकिन से मुलाकात की और उनसे और मास्को सरकार से मामले का हल शीघ्र निकालने में मदद पहुंचाने का आह्वान किया था। कदाकिन ने स्वयं भगवद् गीता के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया था और इस पवित्र ग्रंथ को अदालत में घसीटने को पागल व्यक्तियों की करतूत बताया था।
उल्लेखनीय है कि भगवद् गीता रूस में पहली बार वर्ष 1788 में प्रकाशित हुई और इसके बाद अनेक भाषाओं में इसका कई बार अनुवाद हो चुका है।


