संभावना है कि कहानी पढ़ते वक्त आपको सारी बातें रूमानी लगे. यकीन मानिए ऐसी ही रही थी हमारी जिंदगी. कहानी को कहानी की तरह पढ़े तो तकलीफ नहीं होगी. साहित्य और सरोकार की तलाश में आप उसे उसी स्तर पर पाएंगे जहां से हम अपने परिवार के दरवाजे की सिटकनी चढ़ाते हुए चरसी रात की चादर ताने प्रेम और रतजगे करते हैं.

तब दो अलग जिंदगियों का मिलना हुआ था कमरा नम्बतर 105 में. अब एक ही जिंदगी बची है. साढ़े तीन सौ कमरे रहे होंगे टर्नर हॉस्टाल में. अब एक भी नहीं है. महज पांच साल पहले की बात . न जाने बब्बू. भय्या कहां गए, हमारा पेट वही पालते थे. बाद में सुना था कि होंडा सिटी से चलने वाले हमारे प्रिसिंपल ने उन्हेंल पढे-लिखे मास्ट5रों को पानी पिलाने का काम सौंप दिया था. पुराने पियक्क ड़ तो मेस तक पहुंच जाते थे लेकिन नए जहाजों के कमरे तक खाना वही पहुंचा देते थे. जहाज कॉलेज में नई एंट्री को कहा जाता था. जैसे- ए जहाज तनि कमे उड़ा.

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