समझौते तो हर जगह करने पड़ते हैं! फिर प्यार में क्यों नहीं ? मन में बनी आदर्श छवि न मिले तो घुटते क्यों रहें! जो आपके थोड़ा मनमाफिक भी है उसे प्यार से पूरा बना लें!
आप जीवन में हर समय एक प्रकार की पूर्णता या आदर्श स्थिति की तलाश में रहते हैं। उस आदर्श स्थिति की छवि आप खुद गढ़ते हैं। परीक्षा का नतीजा हो या नौकरी, दोस्ती, मकान, पोशाक, रंग-रूप और खान-पान आदि सबके लिए आपके मन में एक आदर्श चित्र बनता रहता है और यदि आपको प्राप्त वस्तु या स्थिति उस तस्वीर से मेल नहीं खाती तो आप निराश हो जाते हैं।
आपको लगता है कि आप उतने भाग्यशाली नहीं हैं, जितने कि दूसरे हैं। पर आप यह जानकर हैरान होना नहीं चाहते हैं कि जिसे आप आदर्श उपलब्धि प्राप्त भाग्यवान मनुष्य मान रहे थे, वह खुद अपने अधूरेपन की कसक मन में लिए घूम रहा था। परिपूर्णता या आदर्श स्थिति का मापदंड एक काल्पनिक कसौटी है जिसके पीछे भागने वाला हमेशा उदास व खोया-खोया रहता है और जिसने इस काल्पनिक परिपूर्णता की गुत्थी सुलझा ली वह हर तरह की स्थिति को अपने पक्ष में ढालकर खुश होना सीख जाता है। कोई सड़क किनारे बिक रही मनपसंद चीज खरीदकर ही खुशी से दमक उठता है और कोई बड़े मॉल से सामान खरीदकर भी उसे घर लाकर एक कोने में फेंक कर लंबी आहें भरता है।
यही सोच और मनःस्थिति रिश्तों के संदर्भ में भी लागू होती है। एक आदर्श साथी की छवि अपने दिमाग में रखने और अपेक्षा के अनुरूप उसे प्राप्त नहीं कर पाने के कारण आपका मन कभी भी पूर्णता महसूस नहीं करता है। बस आपके दिलोदिमाग में यही सवाल गूंजता रहता है कि दूसरे का साथी आपसे अच्छा क्यों? आपने जिसे चुना उसमें ऐसी कमियां क्यों ? और कई बार ऐसे सवाल इतना सिर चढ़कर बोलने लगते हैं कि बना-बनाया खेल बिगड़ जाता है ।
तारा (बदला हुआ नाम) भी इसी परिपूर्णता के चक्कर में अपना समझा-बूझा रिश्ता ठुकराकर पछता रही है। उन्हें लगा जिस प्यार की तस्वीर वह अपने में बसाई हुई थीं वह जतिन (बदला हुआ नाम) के प्यार में नहीं है। पिछले दो वर्षों से दोनों आपसी नोंक-झोंक के बावजूद बहुत ही प्यार से समय बिता रहे थे। जतिन तो इस रिश्ते को शादी में परिवर्तित करने का ख्वाब देखने लगा था। पर तारा अक्सर मन ही मन जतिन को जीवनसाथी के रूप में सोचकर उतनी उत्साहित नहीं होती थी जितनी कि उसे अपने-आपसे अपेक्षा थी।
उसके संशय और अनमनेपन ने आखिरकार इस रिश्ते को तोड़ दिया। पर अब तारा फिर से उसे पाना चाहती हैं क्योंकि कई दोस्तों को परखने के बाद अब उन्हें अपनी भूल का एहसास हो गया है। पर जतिन का दिल इतना टूट गया है कि वह तारा पर किसी भी तरह से विश्वास करना ही नहीं चाहता है।
तारा जी! दुनिया के हर रिश्ते में समझौता करना पड़ता है। यहां तक कि मां-बाप और बच्चों के रिश्ते भी वैसे आदर्श नहीं होते जैसा कि आप सोचती हैं। जिस रिश्ते में ढेर सारी खुशियां हों वहां छोटी-मोटी अनचाही बातें, आदतें कोई खास मायने नहीं रखनी चाहिए। समय के साथ-साथ प्यार बढ़ने के कारण बहुत-सी आदतें बदल भी जाती हैं। किसी एक की ओर से भी कोशिश होती है तो उसका प्रभाव दोनों पर पड़ता है। पर दिक्कत वहां आती है जहां एक साथी अपने-आपको बिल्कुल बंद कर ले और दूसरी ओर अपने नए साथी की तलाश शुरू कर दे।
सच तो यह है कि आपका यह नजरिया आपको कभी भी खुशी का पल महसूस नहीं करने देता है और आप हमेशा बेहतर की तलाश में ही चक्कर काटती रह जाती हैं। होना तो यह चाहिए कि जिसमें साठ प्रतिशत भी आपके मन मुताबिक गुण हों उनमें आप जीवनसाथी की संभावना देखें और अपनापन से उस साठ प्रतिशत को अस्सी प्रतिशत तक बढ़ा लें। अब बीस प्रतिशत की जो खाई हमेशा बनी रहेगी उसे स्वीकार कर ही आपको आगे बढ़ना चाहिए। आपकी बुनियादी पसंद होती है तभी आप किसी से जुड़ पाते हैं और साल-दो साल उस रिश्ते को निभा पाते हैं। इतने लंबे समय तक किसी रिश्ते को निभाने के बाद यदि फिर से नए रिश्ते की तलाश शुरू कर दें तो सारी ऊर्जा व मेहनत बेकार जाती है।
ऐसी हालत में रिश्ता तोड़ने वाला और जिससे रिश्ता तोड़ा गया है, दोनों ही आहत व परेशान हो जाते हैं। बेहतर यही है कि सोच-समझकर रिश्ते में अपनापन और आत्मीयता का अंश डालें, यदि रिश्ते में अपनत्व व निजीपन को जगह दे रहे हैं तो उसे छोटे-छोटे समझौतों के साथ निभाएं। हो सकता है, आपका समझौता दूसरे में सुधार का औजार बने।


