कई बार कुछ अच्छी कहानियां ठीक से प्रमोट न होने और उलझाऊ टाइटल की वजह से कहीं खो सी जाती हैं। फिल्म मैरिड टु अमेरिका के साथ भी यही हुआ है। फिल्म का टाइटल फिल्म की कहानी और विषय वस्तु से दूर-दूर तक कहीं से भी मेल नहीं खाता।
दो हफ्ते पहले तक भी किसी को भनक नहीं थी कि ऐसी कोई फिल्म रिलीज भी होने वाली है। ऐसे में फिल्म के लीड कलाकारों में अर्चना जोगलेकर और जैकी श्रॉफ का नाम होना फिल्म को और पीछे धकेल देता है।
बावजूद इसके यह फिल्म ठीक ठाक ढंग से बनाई गई अच्छी फिल्म है, जिसे अगर थोड़ा और ढंग से ट्रीट किया जाता तो शायद यह लोगों की आंखों में चढ़ जाती।फिल्म की कहानी अंजलि मल्होत्रा (अर्चना जोगलेकर) और उसके गुमशुदा पति रवि (चेतन पंडित) पर आधारित है। रवि एक अमेरिकी कंपनी का चीफ इंजीनियर है, जिस पर आरोप है कि वह दरभंगा डैम की तबाही का जिम्मेदार है। डैम की खोज खबर लेने भारत आया रवि जब कई हफ्तों तक अमेरिका नहीं पहुंचता तो अंजलि उसका पता करने भारत आ जाती है।
यहां आते ही उसे पता चलता है कि उसके पति का किसी ने अपहरण कर लिया है।धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि इस पूरे प्रकरण में एक अन्य इंजीनियर सहित प्रदेश के मुख्यमंत्री (अखिलेन्द्र मिश्र) और एसपी का भी हाथ है। वह मदद के लिए किसी तरह से एक स्थानीय दबंग विष्णु मल्लाह (अशोक समर्थ) की शरण में चली जाती है, लेकिन दूसरी ओर एक अन्य दबंग प्रताप सिंह (जैकी श्रॉफ) उसकी जान का दुश्मन बन जाता है। प्रताप ने ही मुख्यमंत्री के कहने पर रवि को बंदी बना रखा है। विष्णु और प्रताप के बीच ठन जाती है।
मौका देख प्रताप मुख्यमंत्री को ही ब्लैकमेल करने लगता है। किसी तरह से रवि और अंजलि दोनों आजाद हो जाते हैं। ऐसे में रवि मीडिया के सहारे सारी सच्चाई उगल देता है, जिससे पूरे प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में एक भूचाल-सा आ जाता है।कान्सेप्ट के लिहाज से इस फिल्म की कहानी और उसके ट्रीटमेंट में काफी संभावना नजर आती है। फिल्म की कहानी अपहरण और भ्रष्टाचार के साथ-साथ एक पत्नी के विश्वास और अटूट प्यार को भी दर्शाती है।
और वो भी एक ऐसे पति के प्रति जो अपने काम के आगे उसकी बिलकुल परवाह नहीं करता। लेकिन फिल्म की लंबाई इसे कई जगहों पर काफी बोझिल और उबाऊ बना देती है, खासतौर से इंटरवल के बाद। कई सीन्स बेवजह लंबे खींच दिए गए हैं।क्लाईमेक्स में रवि अपनी पत्नी को एक संदेश देता है, जो अनावश्यक बहुत लंबा खींच दिया गया है। इसके अलावा गीतों के माध्यम से भी फिल्म को काफी खींचा गया है। फिल्म की अवधि करीब ढाई घंटे है। अगर इसकी अवधि दो घंटे के आस-पास रखी गई होती तो मजेदार रहता।मजे की बात है कि फिल्म की लीड एक्ट्रेस से ज्यादा फिल्म के अन्य कलाकारों ने प्रभावित किया है। जैकी श्रॉफ लंबे समय बाद एक संतुलित भूमिका में नजर आते हैं।
विष्णु मल्लाह के रोल में अशोक समर्थ जमे हैं। देखा जाए तो बिहार के दो दबंगों के रूप में जैकी और अशोक के किरदारों को जरा भी ओवर नहीं होने दिया गया है। दूसरी ओर रघुबीर यादव का काम भी बढ़िया है। हालांकि ऐसा रोल उनके बाएं हाथ का खेल है। फिल्म में गालियों का इस्तेमाल भी जम कर किया गया है, जिसकी वजह से इसे ए सर्टिफिकेट दिया गया है। हालांकि ये गालियां कुछ कम भी की जा सकती थीं। खासतौर से अखिलेन्द्र मिश्र के मुंह से निकली गालियां। अर्चना जोगलेकर ने काफी कोशिश की है खुद को एक एक्ट्रेस के रूप में ढालने की, लेकिन?कलाकार: अर्चना जोगलेकर, जैकी श्रॉफ, चेतन पंडित, रघुबीर यादव, अशोक समर्थ, अखिलेंद्र मिश्र
निर्माता: डीएनए मूवीज
निर्देशक: दिलीप शंकर
संगीत: अनवर हुसैन
गीत: इब्राहिम अश्क
विशाल


