उर्दू के मशहूर शायर शहरयार नहीं रहे. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में सोमवार शाम शहरयार ने अंतिम सांसे लीं.
उर्दू साहित्य में योगदान के लिए साल 2011 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शहरयार को आज अलीगढ़ में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.
फिल्म 'उमराव जान' के गाने 'ये क्या जगह है दोस्तों...', 'जिंदगी जब भी बज्म में लाती है हमें...' और 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं...' जैसे गानों को शब्द देने वाली कलम अब खामोश हो गई है.
जी हां, उर्दू के मशहूर शायर अखलाक मोहम्मद खान उर्फ शहरयार अब हमारे बीच नहीं हैं.
उत्तर प्रदेश के बरेली में 1936 को जन्मे शहरयार ने अलीगढ़ में अंतिम सांस ली. साहित्य आकादमी पुरस्कार से सम्मानित शहरयार को पिछले साल ही ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
उर्दू साहित्य में योगदान के लिए साल शहरयार को 2011 का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था. ज्ञानपीठ पुरस्कार देने के लिए अमिताभ बच्चन मुंबई से दिल्ली आए थे.
शहरयार ने उर्दू साहित्य को बड़ा योगदान तो दिया ही साथ ही कई मशहूर हिंदी फिल्मों के लिए गाने भी लिखे.
शहरयार नहीं रहे लेकिन 'उमराव जान' और 'अंजुमन' समेत कई फिल्मों के लिए लिखे उनके गाने आज भी लोगों की जुबान पर ताजा हैं.


