एनसीटीसी पर राजनीति

Hits: 46 smaller text tool iconmedium text tool iconlarger text tool icon

altआतंकवाद से मुकाबले के लिए नेशनल काउंटर टेररिम सेंटर (एनसीटीसी) के गठन की केंद्र सरकार की घोषणा को लेकर रायों में विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। पहले इसका विरोध चार राज्यों के मुख्यमंत्री कर रहे थे, जिनमें सबसे ज्यादा मुखर प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थी, लेकिन अब उनके समेत 10 रायों के मुख्यमंत्रियों ने मोर्चा खोल दिया है। विरोध करने वालों में गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री शामिल हैं। इनका कहना है कि ये देश के संघीय ढांचे पर प्रहार है और राय की शक्तियां हड़पने की कोशिश है। एक साथ इतने मुख्यमंत्रियों के विरोध के कारण एक मार्च से एनसीटीसी का काम शुरू करना मुमकिन नहीं दिख रहा है। पहले गृहमंत्रालय ने 3 फरवरी को जारी एक आदेश में कहा था कि एनसीटीसी एक मार्च से काम करना शुरू कर देगा। राय सरकारों की तेज होती लामबंदी से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे देश के नेता आतंकवाद से लड़ने के लिए वास्तव में प्रतिबध्द हैं। ध्यान रहे कि एनसीटीसी को गृह मंत्रालय एक ऐसी सुरक्षा एजेंसी के रूप में देख रहा है जो प्रभावी ढंग से आतंकवाद को नियंत्रित करने का काम कर सके। एनसीटीसी या राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केन्द्र एक ताक़तवर एजेंसी है जिसका गठन आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए गैरकानूनी गतिविधि, निरोधक कानून के तहत किया गया है। एनसीटीसी ख़ुफिया एजेंसी गृहमंत्रालय के ज़रिए आईबी के तहत आएगी। आईबी के अतिरिक्त निदेशक के रैंक का एक अधिकारी इस एजेंसी का प्रमुख होगा। केंद्र सरकार ने जो आदेश जारी किया है उसके अनुसार केंद्र सरकार की एजेंसियाँ आतंकवाद से जुड़े किसी भी मसले में देश भर में कहीं भी जाकर तलाशी ले सकती हैं और गिरफ्तारियाँ कर सकती हैं। आदेश के अनुसार केंद्रीय एजेंसियाँ राय की पुलिस को भरोसे में लेगी लेकिन अपनी किसी कार्रवाई के लिए उसे राय की सरकार और राय पुलिस से किसी तरह की अनुमति की जरुरत नहीं होगी।

राज्यों को सबसे ज्यादा आपत्ति इसी व्यवस्था पर है। संविधान के अनुसार कानून व्यवस्था राय सरकार का अधिकार है और केंद्र की एजेंसियाँ राय की अनुमति के बिना रायों में कोई कार्रवाई नहीं कर सकतीं। निश्चित रूप से संघीय ढांचे की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आतंकवाद राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को प्रभावित करने के साथ देश की संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा बन गया है। कानून एवं व्यवस्था रायों का विषय है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि विभिन्न रायों अथवा केंद्र एवं राय सरकारों के बीच समन्वय के अभाव में आतंकी, नक्सली व चरमपंथी संगठन मजबूत होते जा रहे हैं। समन्वय के अभाव के कारण कई गंभीर मामलों में देश को न केवल नुकसान उठाना पड़ा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी है। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने राज्य सरकारों की शिकायतों को खारिज करते हुए कहा है कि एनसीटीसी के मामले में रायों के साथ विचार विमर्श की जरूरत नहीं थी क्योंकि इसे गैरकानूनी गतिविधि निरोधक मौजूदा कानून के तहत बनाया गया है। यह कई सालों से लागू है और सरक्षा एजेंसियां इसी के तहत काम कर रही थीं। सिंह ने कहा कि एनसीटीसी इसलिए बनाई जा रही है ताकि आतंकवाद को रोकने के लिए काम कर रही एजेंसियां आपस में सहयोग कर सकें। हम कोई नया कानून नहीं बना रहे हैं। जिन सेक्शनों की चर्चा की गई है वे छह सात साल से लागू हैं, इसको लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए।

यह निराशाजनक है कि जब रायों को आतंकवाद से लड़ने के लिए आगे आना चाहिए तब वे अपने अधिकारों के हनन का शोर मचाने में लगे हुए हैं। प्रतीत होता है कि आंतरिक सुरक्षा के सवाल पर फिर से संकीर्ण स्वार्थो की राजनीति हावी हो रही है। ऐसी ही राजनीति पोटा के मामले में भी हुई थी और टाडा के मामले में भी। आज यही काम गैर कांग्रेसी दल कर रहे हैं। राजनीति इस कदर हो रही है कि ममता बनर्जी के तेवर देख भाजपा उन्हें एनडीए में शामिल होने का न्यौता दे रही है और नवीन पटनायक रायों के अधिकारों का सवाल उठाने के साथ-साथ तीसरे मोर्चे की संभावना भी टटोल रहे हैं। भाजपा नेताबलबीर पुंज सलाह दे रहे हैं कि केंद्र को ऐसा कोई भी कानून बनाने से पहले सभी दलों से बात करना चाहिए थी। गोया यह मुद्दा राष्ट्रहित का नहींदल हितों का हो। जब सभी दल अलग-अलग विचारधाराओं के हैं तो किसी मुद्दे पर उनमें सहमति बने, यह लगभग नामुमकिन है। उस पर भी जब मुद्दा आतंकवाद का आता है तो धार्मिक कट्टरपंथी सोच हावी हो जाती है, जिसके कारण एकमत निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए देशहित को सर्वोपरि रख बहुमत से फैसले लोकतंत्र में लेने की परंपरा है। आंतरिक सुरक्षा के मामले में केंद्र और रायों की तकरार के चलते ही संघीय पुलिस सरीखे किसी तंत्र का निर्माण नहीं हो पा रहा है। राय सरकारें जानबूझकर यह देखने से इंकार कर रही हैं कि अनेक देशों में संघीय पुलिस प्रभावी ढंग से काम कर रही है। दरअसल अंतररायीय अपराधों पर अंकुश तभी लग सकता है जब पुलिस का कोई संघीय स्वरूप सयि हो। अमेरिका व अनेक यूरोपीय देशों में भी संघीय पुलिस सफलता से काम कर रही है। फिलहाल केंद्र को रायों को यह विश्वास दिलाना होगा कि वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करेगा। रायों को यह भय सताता रहता है कि यदि केंद्रीय संस्थाओं का अधिकार बढ़ा तो उनके अधिकारों का हनन हो सकता है। यह भय निराधार नहीं, लेकिन कम से कम आतंकवाद से लड़ने के मामले में तो राजनीति नहीं की जानी चाहिए।