सहारा इस बात की पुष्टि करता है कि वह भारतीय टीम का प्रायोजन जारी रखेगा। इस वाक्य के साथ पिछले 11 दिनों से भारतीय क्रिकेट जगत के आर्थिक क्षेत्र में मची हलचल शांत हो गई है। आखिर सहारा इंडिया और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का साथ पिछले 11 सालों का है। 11 सालों की मैत्री पर 11 दिनों की कड़वाहट बेअसर होनी ही थी, विशेषकर तब जबकि मामला धन से जुड़ा हो।
गत 4 फरवरी को जब सहारा इंडिया ने भारी मन से बीसीसीआई के प्रायोजक पद से खुद को हटा लिया था, तो क्रिकेट जगत के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया था कि अब गाड़ी रफ्तार कैसे पकड़ेगी, वह भी उस समय जबकि आईपीएल के पांचवे संस्करण के लिए बोलियां लगनी थींऔर सहारा इंडिया उसकी एक टीम पुणे वारियर्स का भी मालिकाना हक रखता है। दरअसल पिछले संस्करण में युवराज सिंह पुणे वारियर्स के कप्तान थे। अब वे टयूमर के इलाज के लिए देश के बाहर हैं। ऐसे में सहारा इंडिया चाहता था कि उसे अंतिम 11 में पांच विदेशी खिलाड़ी रखने दिए जाएं। सहारा के मालिक सुब्रत राय के मुताबिक- हमने कहा था कि अगर एक या दो टीम कमज़ोर रहीं, तो टूर्नामेंट पर इसका बुरा असर पड़ेगा। टीमों में बराबरी होनी चाहिए। नई टीमों को कुछ तो फायदा देना चाहिए। कम से कम अधिक विदेशी खिलाड़ी खिलाने का ही अधिकार दे देना चाहिए। लेकिन हमारी सुनी नहीं गई। मै किसी को दोष नहीं देना चाहता। उन्होंने आगे कहा था- मैं खिलाड़ियों को लेकर चिंतित हूँ और चाहता हूँ कि हमारे आईपीएल से जाने के बाद भी हमारे खिलाड़ी खेलें इसलिए हमने अनुरोध किया है कि खिलाड़ियों को किसी और इच्छुक कोर्पोरेट को दे दिया जाएं। युवराज सिंह के मामले पर सहारा का कहना था कि युवराज का अभी इलाज चल रहा है। हमने बीसीसीआई से अनुरोध किया था कि हम युवराज की जगह पर सौरव गांगुली को पुणे टीम में रखना चाहते हैं लेकिन बोर्ड ने नियमों का हवाला करते हुए ऐसा करने से मना कर दिया। हमें ऐसा लग रहा है कि हमारे साथ धोखा हुआ है। इसलिए हमने बोर्ड से रिश्ता तोड़ने का फैसला किया। दोनों के बीच तनातनी सिर्फ इतनी ही नहींथी।
पिछले साल आईपीएल के लिए टीम की ख़रीददारी के दौरान 94 मैच और 10 टीमों के हिसाब से पैसा लिया गया। लेकिन सिर्फ 74 मैच खेले गए, जिससे सहारा को नुकसान हुआ था। बोर्ड ने नुकसान हुए पैसों को वापस नहीं किया था। इसी प्रकार दक्षिण अफ्रीका में विश्व कप आयोजन के दौरान खिलाड़ियों के शर्ट पर सहारा का लोगो नहीं इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि ये दक्षिण अफ्रीका की सहारा एयरलाइन्स से सहारा का लोगो से मिलता जुलता था। इस हिसाब से सहारा को दो मैच के लिए फीस नहीं देनी थी। लेकिन इस सबके बावजूद सहारा ने दोनों मैचों के लिए खिलाड़ियों को पूरी रकम अदा की थी। इन सब बातों के मिले-जुले असर ने सहारा का मन शायद खट्टा कर दिया हो और उसने बीसीसीआई के प्रायोजक होने से हाथ पीछे खींच लिए। जाहिर है क्रिकेट की राजनीति और व्यापार करने वालों को इस लड़ाई से भारी नुकसान का अंदेशा रहा हो, विशेषकर आईपीएल शुरु होने के पहले। इसलिए पूरी तरह रिश्ते टूटते, इससे पहले वार्ता की कोशिशें जारी रहीं, जिसके सुपरिणाम सामने आ रहे हैं। अब बीसीसीआई और सहारा इंडिया समूह के बीच विवाद सुलझ जाने से भारतीय किेट टीम के प्रायोजन और इंडियन प्रीमियर लीग पर छाया संकट टल गया है। बीसीसीआई ने कई शर्तों के साथ सहारा की माँगें मान ली हैं जिसके बाद अब सहारा फिर से भारतीय टीम का प्रायोजक होगा और उसकी पुणे वॉरियर्स टीम आईपीएल में बरकरार रहेगी। दोनों की ओर से जारी साझा बयान में कहा गया है कि गहन चर्चा के बाद बीसीसीआई ने सहारा के अनुरोध पर ध्यान दिया और कई बातों पर सहमति जताई है। बीसीसीआई अब सहारा को पाँच विदेशी खिलाड़ियों को शामिल करने की संभावना तलाश करने की अनुमति दे रहा है। बयान के अनुसार अब आईपीएल का ट्रेडिंग विंडो यानी वो समय जिस दौरान दो टीमें आपस में खिलाड़ियों की अदला-बदली कर सकती हैं उसे बढ़ा दिया गया था। पहले 17 फरवरी को इसकी सीमा थी मगर अब ये अदला-बदली 29 फरवरी तक हो सकती है। इस तरह सहारा की पुणे वॉरियर्स को अपनी टीम और मजबूत करने का मौका मिलेगा। सहारा ने ये भी माँग की थी कि एक प्ले ऑफ़ मैच यानी वे मैच जिनमें शीर्ष चार टीमें खेलेंगी वो बंगलौर की जगह पुणे में कराया जाए, इस पर बीसीसीआई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि प्ले ऑफ़ मैच आयोजित करने का अधिकार उन शहरों को होता है जिनकी टीमें पिछली बार फाइनल में पहुँची थीं। इस स्थिति में ये अधिकार रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर के पास है। ऐसे में अगर रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर को आपत्ति नहीं होती है तो बीसीसीआई इससे सहमत होगा। कुल मिलाकर सहारा की अधिकतर शर्तों को थोड़ी ना-नुकुर के बाद बीसीसीआई ने मान ही लिया है। आखिर वह व्यापार करने बैठी है, पुण्य कमाने नहीं, जो नैतिक-अनैतिक के फेर में पड़े। जिसमें मुनाफा दिखाई दे, वह सौदा उसे करना ही है। क्रिकेट पर आया संकट टल गया, इससे क्रिकेट प्रेमियों को भी प्रसन्नता होगी, इस लड़ाई में कौन सही था, कौन गलत या दोनों सही थे और दोनों गलत, इस पर चर्चा अब शायद व्यर्थ है। अंत भला तो सब भला। क्रिकेट को सहारा वापस मिल गया, हाकी में यह सहारा बढ़ेगा या नहीं, यह देखने की बात होगी।


