उत्तर प्रदेश चुनावों में सभी का ध्यान दलित और मुस्लिम मतदाताओं की ओर काफी गया है। लेकिन कुछ ऐसे सवर्ण भी हैं, जो लाचारी की जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं शंभू पांडे और उनकी पत्नी रमा देवी। अपने को उच्च श्रेणी का ब्राह्मण बताने वाले शंभू वाराणसी से करीब 40 किलोमीटर दूर गुरई गाँव के निवासी हैं और यहाँ पिछले 35 वर्षों से रह रहे हैं।
एक लंबी सी, न खत्म होने वाली सी मेढ़ पर से चला कर अपने साथ अपनी झोपड़ी में ले गए, तो मैं दंग रह गया। अंदर पुराने ज़माने का एक बड़ा सा पलंग था और एक खस्ताहाल ड्रेसिंग टेबल भी पड़ा हुआ था। लेकिन जमीन पर कई सारे बिस्तर बिछे देखकर मैं पूछ ही बैठा, कि आखिर ये किसके हैं?
शंभू पांडे का जवाब मिला, 'साहब हमारे सात बच्चे हैं। अब एक झोपड़े में न तो सात पलंग आ सकते हैं और न ही हमारी उन्हें खरीदने की हैसियत है।'
इनके परिवार की दाल-रोटी उस थोड़े से अनाज पर चल रही है, जो इनके मुठ्ठी भर खेत में हो पाता है। बच्चे मुफ्त में पढ़ते हैं और घर के राशन पानी के लिए ये कभी दूसरे के खेत में काम करते हैं तो कभी अपने खेत की सब्जी लेकर बेचने का प्रयास करते हैं।
शिकायत : शंभू पांडे को हर किसी से एक ही शिकायत है। उन्हें लगता है कि पिछले 20 वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश का आम मतदाता जात-पात के चक्कर में फँस गया और इससे एक नहीं दो नुकसान हुए हैं।
वे कहते हैं, 'मंडल-कमंडल के चक्कर में गाँव में रहने वालों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। हम तो मुलायम-मायावती के फेर में फँस गए। पहला रहता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का और दूसरी रहती है तो लखनऊ और अंबेडकर नगर का ही विकास होता है।'
शंभू पांडे की पत्नी रमा देवी रोज सुबह चार बजे उठती हैं। बच्चों और पति का खाना बनाने के बाद वे करीब 300 मीटर दूर जाकर हैंड पम्प से पानी भर कर लाती हैं, इसके बाद सात में से पांच बच्चों के स्कूल जाने का समय हो जाता है।
रमा देवी कहती हैं, 'हम लोग पंडित हैं इसलिए आज तक किसी ने नहीं पूछा कि आपका भला कैसे किया जाए। लेकिन हमने भी उम्मीद नहीं छोड़ी है, अपनी लड़कियों तक को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं।'
शंभू पंडे को एक मलाल जरूर है। उन्हें लगता है कि अपने चचेरे भाइयों की तरह उन्हें भी दस-पंद्रह साल पहले मुंबई जाकर पैसा कमाना चाहिए था। उन्हें लगता है कि उनके भाई उनसे बहुत आगे निकल गए हैं। यहाँ तक कि दो-तीन साल में जब वो गाँव आते हैं तो उन लोगों के लिए तोहफे तक ले कर आते हैं। लेकिन शंभू पांडे बदले में कुछ नहीं कर पाते।
हालांकि शंभू की पत्नी को इस बात का कोई मलाल नहीं और उन्हें लगता है कि कभी तो प्रदेश में कोई ऐसी भी सरकार आएगी, जो सवर्णों की भी व्यथा सुनेगी।


