चेन्नई में नौवीं कक्षा के एक बच्चों ने अपनी शिक्षिका की चाकू मारकर हत्या कर दी। समाज में इस तरह की हिंसा के बारे में जो धारणाएं होती हैं, उन्हें यह पूरा प्रसंग उलट देता है। यह माना जाता है कि गरीब बस्तियों में ही इस प्रवृत्ति के बच्चों होते हैं, वे सस्ते या सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। बच्चों अपने आस-पास इस तरह की हिंसा देखते हैं और उनमें साधनहीनता की वजह से गुस्सा भी पैदा होता है, शिक्षक भी बच्चों को पीटते रहते हैं। इस प्रसंग में ऐसा कुछ नहीं है। जिस स्कूल में यह घटना घटी, वह प्रतिष्ठित निजी स्कूल है। आरोपी लड़का भी समृद्ध परिवार से है, जिसे रोज स्कूल जाने-आने के लिए कार थी। जानकार बताते हैं कि बच्चा बेहद लाड़-प्यार में पला था और स्कूल में दूसरे बच्चों से ज्यादा मिलता-जुलता नहीं था। वह नियमित स्कूल आता तो था, लेकिन पढ़ाई में मन नहीं लगाता था, इसलिए उसकी शिक्षिका ने उसकी डायरी में शिकायत दर्ज की थी, ताकि उसके माता-पिता को यह जानकारी मिले। इससे नाराज होकर यह बच्चा घर से चाकू लेकर आया और उसने अपनी शिक्षिका की हत्या कर दी।
इन तमाम तथ्यों से यह जाहिर होता है कि समृद्ध परिवारों के लाड़-प्यार में पले बच्चों भी हिंसक हो सकते हैं, अगर उनमें सही संस्कार न पड़ें। पिछले कुछ वर्षों में समाज के अनेक वर्गो में अचानक समृद्धि आई है और उनमें उस समृद्धि का दुरुपयोग करने या दिखावा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। आजकल परिवार बेहद छोटे होते हैं, इसलिए ऐसे अमीर परिवार के बच्चों में सुनने या समझौता करने या बांटने की प्रवृत्ति नहीं होती। अक्सर नवधनाढ्य अपसंस्कृति में एक गहरी आक्रामकता और असहिष्णुता होती है, इसीलिए हम ऐसे परिवारों के नौजवानों के हिंसक व्यवहार के किस्से सुनते हैं। संभवत: यह बच्चा भी बेहद सुरक्षित माहौल में बढ़ा-पला, इसलिए न वह अपने साथियों से घुल-मिल पाया, न ही शिक्षिका की सख्ती बर्दाश्त कर पाया।
ऐसा लगता है कि उसके परिवार ने भी इन समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया। उसके अभिभावक उसे लगातार ऐसा माहौल देते रहे, जिसमें किसी किस्म की सख्ती या अनुशासन की जगह नहीं थी। यह भी लगता है कि इस बच्चों के साथ कुछ व्यवहारगत या शैक्षणिक समस्या थी। अक्सर बच्चों में ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं होती हैं, जिनसे वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पाता। इसका इलाज सख्ती नहीं, बल्कि किसी मनोचिकित्सक से राय लेना ही है, जो ऐसी समस्या को पहचानकर उसका इलाज करे। लेकिन इसके लिए स्कूल और परिवार, दोनों को इस बात को समझना होगा। ऐसे कई बच्चों होते हैं, जो स्वभावत: हिंसक होते हैं और उनकी यह हिंसक प्रवृत्ति या तो टेलीविजन या वीडियो गेम की हिंसा से और अधिक तेज हो जाती है या फिर अतिरिक्त सख्ती व सजा की वजह से ज्यादा पुख्ता हो जाती है। संभव है कि ऐसे बच्चों बुद्धिमान और संवेदनशील हों, लेकिन उन्हें गुस्से और हिंसा पर काबू के लिए मनोचिकित्सक की मदद की जरूरत हो सकती है। इसके अलावा पैसे और रुतबे के दिखावे को हमारे समाज में जैसी स्वीकृति मिल गई है, वह काफी खतरनाक है।
भारतीय समाज में अभी-अभी तक दिखावा बुरी चीज मानी जाती थी और परंपरागत समृद्ध परिवारों में अनुशासन व विनम्रता पर जोर दिया जाता था। जरूरी यह है कि नए जमाने के बच्चों में सुनने की और सामूहिकता की आदत विकसित हो, जो पहले संयुक्त परिवारों में स्वाभाविक रूप से बच्चों में ये आदतें आ जाती थीं। शिक्षिका की मृत्यु दुखद है और साथ ही यह भी दुखद है कि एक भटका हुआ बच्चा इतना गंभीर अपराध कर डाले। हमारे समाज को अपने मूल्यों पर पुनर्विचार करना चाहिए।


