मालदीव में सत्ता परिवर्तन

Hits: 48 smaller text tool iconmedium text tool iconlarger text tool icon

Regime change in Maldivesमालदीव में सत्ता परिवर्तन विश्व के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य और हालिया इतिहास की एक अनूठी घटना है। इसका अनूठापन सत्ता परिवर्तन के तरीके व  उसके बाद की परिस्थितियों में देखा जा सकता है। गत वर्ष अरब देशों में आई क्रांति तानाशाही हटाने के लिए हुई, लेकिन अब तक वहां की जनता को राजनीतिक स्थिरता नहींमिल पायी है। अशांति पहले से ज्यादा है और भविष्य आशंकित। मालदीव में भी सत्ता परिवर्तन की घटना घटी, लेकिन अलग तरीके से।

पिछले कई सप्ताह से राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चल रहे थे और जब उन्होंने देशहित में इस्तीफा दे दिया तो एक दिन बाद ही उसी रिपब्लिक चौक पर शांति विराजमान थी, लोग परिवारों के साथ घूम रहे थे, जहां अब तक लोग विरोध करने उतर रहे थे। मालदीव में राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ और फिलहाल टल गया, ऐसा नजर आ रहा है। लेकिन आशंका यह है कि वर्तमान शांति आने वाले तूफान की सूचना तो नहींदे रही। यह तूफान मालदीव में आए या किसी और देश में, विश्व के शांतिप्रिय, उदार देशों को इस पर नजर रखना चाहिए। गौरतलब है कि वर्ष 2008 में मोहम्मद नशीद ने पहली बार मालदीव का परिचय लोकतंत्र से करवाया था। 30 वर्षों से चली आ रही मौमून अब्दुल गयूम की तानाशाही को खत्म किया था। मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में तो नशीद ने सफलताएं अर्जित कीं, किंतु लोकतंत्र को जीत वे नहींदिलवा सके। जनता का बहुमत पूर्व राष्ट्रपति गयूम के पक्ष मेंही रहा। संसद में भी बहुमत गयूम समर्थकों का रहा।

राजनैतिक प्रेक्षकों का कहना है कि नशीद के सत्ता संभालने के बाद एक तरह से संवैधानिक ठहराव आ गया था, क्योंकि अधिकतर राजनैतिक दल गयूम समर्थक हैं। मालदीव की वर्तमान स्थिति की भूमिका पिछले कुछ समय से लिखी जा रही थी। एक वरिष्ठ न्यायाधीश को जब ये कहकर हटाया गया कि वे विपक्ष के प्रति वफ़ादार हैं तब नाशीद के लिए असली परेशानी शुरु हुई। पहले तो मानवाधिकार कार्यकर्ता इसके ख़िलाफ  सामने आ गए। फिर ये विवाद इतना गरमा गया कि संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मांग होने लगी। लेकिन इसकी जड़ में दरअसल राष्ट्रपति नाशीद और पूर्व राष्ट्रपति गयूम के बीच की राजनीतिक खींचतान है। चार साल पहले चुनाव जीतने के बाद ही नाशीद पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मु्द्दों पर एक मुखर स्वर बनकर उभरे थे। उन्होंने समुद्र के भीतर कैबिनेट की बैठक लेकर विश्व को यह संदेश दिया था कि अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर सचेत न हुआ जाए, तो भविष्य में ऐसे द्वीपीय देशों के जलमग्न होने का खतरा बना रहेगा। लेकिन अपनी अलहदा शैली के बावजूद वे गयूम के समर्थकों का निरंतर विरोध झेलते रहे और धार्मिक कट्टरपंथियों का भी, जो उन पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। फिलहाल उपराष्ट्रपति मोहम्मद वहीद हसन ने राष्ट्रपति पद संभाल लिया है। वहीद संरा में काम कर चुके हैं और कूटनीति के अच्छे जानकार हैं। हो सकता है वे मालदीव में आयी अस्थिरता को संभाल लें। पर सवाल अपनी जगह बरकरार है कि जब कट्टरपंथी ताकतें सत्ता परिवर्तन में कामयाब हो रही हैं, तब मालदीव में लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा? यहां बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं। अपने नागरिकों की रक्षा और लोकतंत्र के हित के लिए भारत मालदीव की घटनाओं से निकले संकेतों के गूढ़ार्थ समझे, तो बेहतर होगा।