सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए के गांगुली गुरुवार को रिटायर हो गए। रिटायरमेंट के दिन उन्होंने न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी के साथ 2-जी स्पेक्ट्रम आबंटन के मामले में जो फैसला सुनाया, वह न सिर्फ न्यायपालिका, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैसले के रूप में दर्ज हो जाएगा। उन्होंने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के वर्ष 2008 में दिए हुए 122 लाइसेंस रद्द कर दिए। अब 2-जी स्पेक्ट्रम के आबंटन की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू होगी।
इस फैसले का असर निश्चित रूप से लंबे वक्त तक दिखाई देगा, भले ही सरकार किसी भी गठबंधन या पार्टी की हो। अब कम से कम बड़े मसलों में, खासकर जिनमें राष्ट्रीय संसाधनों का आबंटन शामिल हो, मनमानी प्रक्रिया अपनाने में मंत्री और अफसर हिचकेंगे। इसके अलावा भ्रष्टाचार या निजी रिश्तों के जरिये सरकार के फैसलों को प्रभावित करने में भी उद्योगपतियों को थोड़ा सोचना होगा। जिन कंपनियों को ये लाइसेंस मिले थे, उन्हें बहुत बड़ा झटका लगा है।
उनका आर्थिक नुकसान भी काफी होगा और अगर उन्हें अब स्पेक्ट्रम में हिस्सेदारी चाहिए, तो नए सिरे से नीलामी में भाग लेना होगा।स्पेक्ट्रम पानी, जमीन या खनिज की तरह कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं है, लेकिन देश की धरोहर तो वह है ही। इसका आबंटन इस तरह से होना चाहिए था, जिससे देश का ज्यादा से ज्यादा फायदा होता। लेकिन उदारीकरण के बाद जो तेज आर्थिक विकास हुआ है, उसमें राष्ट्रीय संसाधनों की लूट में हिस्सा बंटाने में उद्योगपति, अफसर और नेताओं की साठगांठ ने अर्थशास्त्र के तमाम नियम ताक पर रख दिए हैं। चाहे जमीन का आबंटन हो या खनिज संपदा का दोहन, इनमें गलत तरीके से अपने खास लोगों को तरजीह दी जाती है और जहां देश का उसमें नुकसान होता है, वहीं ऐसे आबंटन में शामिल लोगों का नाजायज और अनाप-शनाप मुनाफा होता है।राजनीति और व्यापार की ऐसी साठगांठ का संभवत: सबसे बड़ा और सबसे चर्चित प्रकरण 2-जी घोटाला था और यह फैसला बताता है कि लोकतंत्र में जनता, स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका मिलकर ही इस ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ को रोक सकते हैं।
यह जनता और मीडिया का दबाव ही था कि सरकार ने भी 2-जी आबंटन के फैसले को सही ठहराने की अदालत में कोई कोशिश नहीं की।सरकार का तर्क यह था कि चूंकि इस मामले की सीबीआई और अन्य सरकारी एजेंसियां जांच कर रही हैं या कर चुकी हैं, इसलिए सरकार कुछ कहना नहीं चाहती। दरअसल सरकार यह जानती है कि आबंटन की वह प्रक्रिया गलत थी और इसीलिए वह उस फैसले को ए राजा और कुछ अफसरों तक सीमित रखकर खुद को अलग रखना चाह रही है। इस मामले में सरकार को अदालत से कुछ राहत मिली है, जब एक पिछले फैसले में सरकार ने राजा पर मामला दायर करने में देरी के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को दोषी ठहराया और प्रधानमंत्री को संदेह का लाभ दिया।
इस फैसले में भी गृह मंत्री पी चिदंबरम को आरोपी मानने की सुब्रमण्यम स्वामी की अर्जी अदालत ने नहीं मानी और निचली अदालत को इस पर फैसला करने का हक दार बताया।सरकार को यह भी राहत है कि अदालत ने अपनी निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग भी नहीं मानी और सीबीआई को जांच की प्रगति की रिपोर्ट सीवीसी को देने को कहा। इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र सरकार इस मामले की तकनीकी और नैतिक जिम्मेदारी से पूरी तरह बच गई है। शायद आईंदा यह सरकार या भविष्य की कोई सरकार गठबंधन की मजबूरी बताकर किसी भी साफ-साफ गलत फैसले को मंजूरी देने से पहले हजार बार सोचेगी।


