अफसरों की तनातनी

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Officers of the summerउत्तर प्रदेश में आईएएस और आईपीएस सेवाओं के अफसरों का जो झगड़ा खुलकर सामने आया है और जिसमें राज्य सरकार व चुनाव आयोग को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है, यह मामला किसी एक आईएएस अफसर के किसी एक आईपीएस अफसर के साथ दुर्व्यवहार भर नहीं है, इसके पीछे इन दो केंद्रीय सेवाओं के बीच चल रहा लंबा शीतयुद्ध है। ऐसा शीतयुद्ध दुनिया भर की नौकरशाहियों में चलता रहता है, क्योंकि नौकरशाही के हर अंग की कोशिश अपने अधिकार क्षेत्र के बचाव और उसके विस्तार की होती है।

लेकिन उत्तर प्रदेश का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां दोनों सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारी आमने-सामने आ गए और विरोध स्वरूप कई आईपीएस अफसरों ने इस्तीफे तक दे दिए। यह सब तब हुआ है, जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इसलिए चुनाव आयोग भी हरकत में आया। चुनाव आयोग ने बस्ती के कमिश्नर अनुराग श्रीवास्तव को चुनाव संबंधी काम से हटाने का राज्य सरकार को निर्देश दिया और एक आईपीएस अफसर से कथित दुर्व्यवहार के लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया।

इस झगड़े की तात्कालिक वजह किसी एक अफसर की बदमिजाजी हो सकती है, पर इससे पता चलता है कि राज्य में नौकरशाही के इन दो महत्वपूर्ण अंगों में कितना वैमनस्य है और राजनीतिक हस्तक्षेप ने वरिष्ठ नौकरशाही को कितना प्रभावित किया है। कभी उत्तर प्रदेश का प्रशासन देश में श्रेष्ठ माना जाता था और प्रदेश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों से पढ़े हुए अफसर देश के अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर होते थे। लंबे अर्से से नौकरशाही के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा है। इस बीच राजनीतिक अस्थिरता के चलते राजनेताओं ने अफसरों का राजनीतिक इस्तेमाल शुरू किया और अवसरवादी अफसरों ने भी इस या उस राजनेता के साथ जुड़कर सत्ता के लाभ हासिल किए।अक्सर युवा अधिकारियों में ऐसे वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ असंतोष पैदा हुआ, जो फायदे के लिए राजनेताओं के साथ हो गए और जिन्होंने प्रशासन की गरिमा और निष्पक्षता को कम किया था।

छोटे-मोटे राजनेता भी अपना रसूख दिखाने के लिए अफसरों पर दबाव डालते थे और प्रशासन के ढांचे के कमजोर होने की वजह से उनका प्रतिकार करना मुमकिन नहीं था। ये संकेत इसलिए खतरनाक हैं, क्योंकि राजनीति में अस्थिरता हो सकती है, पर प्रशासन का अनुशासित और स्थिर रहना देश के कामकाज के लिए जरूरी है।राजनेताओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी जिम्मेदारियां भी समझों और सीमाएं भी। ऐसा नहीं हुआ, तो नौकरशाह या तो जरूरत से ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे या उनका मनोबल टूट जाएगा। अगर अफसरों में वैमनस्य इस सीमा तक आ गया है, तो इसके गहरे कारण हैं और उनका निवारण नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं फिर घट सकती हैं। युवा आईपीएस अफसर जहां एक ओर आईएएस के वास्तविक या कथित वर्चस्व से नाराज हैं, वहीं उनके असंतोष की वजह राजनीति में छाए अपराधी तत्व भी हैं। इसका उपाय राज्य स्तर पर भी होना चाहिए और केंद्रीय स्तर पर भी।

व्यापक प्रशासनिक और पुलिस सुधारों से ही यह समस्या हल हो सकती है। एक बड़ी जरूरत तमाम केंद्रीय सेवाओं की गरिमा बहाली की है। साथ ही, प्रशासन पर उनके एकाधिकार की भावना को खत्म करने की भी आवश्यकता है।दुनिया भर में प्रशासन में शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान वगैरह क्षेत्रों से प्रतिभावान लोग शामिल किए जाते हैं और वे प्रशासन को समृद्ध करते हैं। प्रशासन को सिर्फ पेशेवर प्रशासकों के लिए सुरक्षित रखने से विशेषाधिकारों के लिए लड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है। 21वीं सदी में 19वीं सदी का प्रशासनिक ढांचा दिक्कतें तो पैदा करेगा ही।