रूश्दी, साहित्य और राजनीति

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Rushdie, literature and politics विवादित होने के कारण चर्चित लेखक सलमान रूश्दी ने मुम्बई अंडरवर्ल्ड से अपनी जान को खतरा होने की महाराष्ट्र, राजस्थान पुलिस की कथित सूचना के कारण जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लेने का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया लेकिन मुम्बई पुलिस ने उनकी जान को खतरे की किसी जानकारी से इंकार कर दिया है।


इसे कोई क्या कहे, यही कि पांच राज्यों में चुनावी मौसम के दौरान यह बडा ही अजब मामला है। गत दिनों दारूल उलूम देवबंद ने रूश्दी के भारत आने का विरोध कर दिया और चुनावी मौसम में सबने इस मुद्दे को हाथोहाथ ले लिया। इस मामले से वे लोग, यानी राजनेता खुश हैं जो इस वक्त कोई सियासी विवाद नहीं चाहते।


दूसरी तरफ वे लोग भी प्रसन्न हैं जो रूश्दी का विरोध करते हैं लेकिन सामने नहीं आना चाहते। लोकतांत्रिक व्यवस्था में वैसे तो रूश्दी के भारत आने पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। उनकी किताब "सैटेनिक वर्सेज" पर विवाद यूं भी बहुत पुराना हो चुका है। विवाद शुरू होने के बाद तो वह भारत आ भी चुके हैं। नियम-कायदे से रूश्दी को भारत आने के लिए वीजा की जरूरत नहीं है। अगर सरकार उन्हें आने से रोकती है, तो वह उदारवादी बुद्धिजीवियों और भाजपा समर्थक शक्तियों के निशाने पर होती। अगर वह उन्हें आने देती है तो मुस्लिम संगठन विरोध करेंगे और विरोधी पार्टियां कांग्रेस को मुस्लिम भावनाओं का खयाल न करने का दोषी बताएंगी। लेकिन कांग्रेस की समस्या यह है कि वह केंद्र और राजस्थान में सत्तारूढ है।


राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने पहले से अनेक झंझावात हैं, ऎसे में रूश्दी का आना उनके लिए एक नया बखेडा खडा करने वाला हो सकता था। कौन सरकार चाहेगी कि किसी लेखक की पक्तियों को लेकर एक बडे समुदाय को नाराज करे क्योंकि लेखक या साहित्य व संस्कृति के नाम पर किसी पार्टी को वोट नहीं मिलते हैं। इसलिए यह सुविधाजनक लगा कि केंद्रीय गृह मंत्री से भेंट कर, कानून-व्यवस्था का मुद्दा खडा कर रूश्दी को आने से रोक दिया जाए।


भाजपा के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है क्योंकि रूश्दी का न आना उन्हें सरकार की आलोचना के लिए एक मुद्दा थमा देगा। रूश्दी आ जाते, तो यह मुद्दा गुम हो जाता। उमा भारती ने शनिवार को बुदेलखंड में अपनी चुनावी सभा में इस मसले को उठा ही लिया व कांग्रेस पर तीर चला डाले। वामपंथियों के लिए भी यही सुविधाजनक है कि इस वक्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दो-चार वक्तव्य जारी कर दिए जाएं अन्यथा वामदल तो पहले भी तसलीमा नसरीन के मामले में अपनी रणनीति जाहिर कर चुके हैं।


इस सारे मामले में बेहतर तो ये होता कि अगर कोई रूश्दी के लेखन से नाराज है तो भी वह क्षमा का धर्म अपनाए। अन्य धमोंü की ही तरह इस्लाम में भी क्षमा का बहुत महत्व है। सवाल ये है कि रूश्दी के भारत आने पर पाबंदी लगाने से समस्याओं का निराकरण नहीं हो सकता। जयपुर के डिग्गी हाउस में पुलिस के कडे पहरे में लिटरेचर फेस्टिवल के डेढ सौ से ज्यादा सत्रों का आयोजन कराना कोई गौरवान्वित करने वाला काम नहीं कहलाएगा। लेकिन चुनावी माहौल में ये ही माकूल लगता है कि फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के झंडाबरदार बने रहें और रूश्दी को आने भी न दिया जाए। फेस्टिवल के आयोजकों ने भी इसी तर्ज पर अपना बचाव किया है। दो लेखकों द्वारा रूश्दी की विवादित पुस्तक के अंश पढे जाने की घटना से आयोजकों ने तत्काल ही पल्ला झाड लिया। यहां लेखक चेतन भगत की सोच सराही जानी चाहिए जिन्होंने विवादित लेखकों के महिमामंडन को पूरी तरह गैरजरूरी व गलत बताया है।


असल बात ये है कि हमारा समाज बहुत ही असहिष्णु हो चला है। हम हर बात पर विवाद पैदा करने लगे हैं, विरोध करने लगे हैं। अपने विचारों के अक्खडपन व कट्टरपन के चलते अक्सर धरना-प्रदर्शन ही नहीं, हिंसा पर भी उतर आते हैं। हमारे यहां स्वस्थ वाद-विवाद की गुजाइशें खत्म होती जा रही हैं। साहित्य व लेखन को लेकर तो वैसे भी आमजन चिंतन नहीं करता, सियासी लोग ही बवाल खडा करते हैं। यही उम्मीद की जानी चाहिए कि ये हालात कभी तो बदलेंगे।