इसरो रिपोर्ट पर बोले नायर, बदनाम करने की साजिश

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Nair said ISRO report, a conspiracy to discreditएंट्रिक्स -देवास डील में चार शीर्ष वैज्ञानिकों को दोषी ठहराने वाली इसरो की रिपोर्ट से जहां विज्ञान जगत सन्न है वहीं, मिशन चंद्रयान को सफल बनाकर दुनिया भर में भारत का झंडा गाढ़ने वाले वैज्ञानिक और पूर्व इसरो चीफ जी. माधवन नायर खुद को दोषी ठहराए जाने से खासे खफा हैं।

उन्होंने आरोप लगाया है कि रिपोर्ट में केवल उन तथ्यों को उजागर किया गया है जिनसे उन्हें बदनाम किया जा सके। जिस समय देवास और एंट्रिक्स के बीच ये समझौता हुआ था, तब माधवन नायर इसरो के अध्यक्ष थे। नायर ने सौदे पर इसरो रिपोर्ट को एकतरफा बताते हुए कहा है कि यह तथ्यों को सामने नहीं लाती। नायर ने कहा, उन्होंने केवल रिपोर्ट व सवालों के जवाब देखे हैं। जांच में कहा गया है कि सौदे में पारदर्शिता की कमी थी।

समिति ने नायर, ए भास्करनारायणन, केआर श्रीधर मूर्ति और केएन शंकर के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। ये सभी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। माधवन समेत इन अधिकारियों के किसी भी सरकारी पद पर नियुक्ति पर रोक लगाई जा चुकी है। समिति ने चार अन्य वैज्ञानिकों के विरूद्ध भी कार्रवाई का प्रस्ताव रखा है, जिनमें एसएस मीनाक्षी सुंदरम, वीणा राव, जी बालचंद्रन और आरजी नाडादुर हैं।

2 लाख करोड़ का गड़बड़झाला

2005 में इसरो की वाणिज्यिक संस्था एंट्रिक्स और निजी कंपनी देवास के बीच एस बैंड स्पेक्ट्रम के लिए डील हुई थी। आरोप ये भी है कि जिस स्पेक्ट्रम की कीमत 2 लाख करोड़ होनी चाहिए उसे महज 1 हजार करोड़ में बेचा गया था।

सरकार की आंखों में धूल झोंकी

रिपोर्ट के अनुसार, मंजूरी की प्रक्रिया केंद्रीय मंत्रिमंडल और अंतरिक्ष आयोग को अधूरी तथा गलत जानकारी देने से भी जुड़ी है। एंट्रिक्स-देवास समझौता 28 जनवरी, 2005 को हुआ था, लेकिन 27 नवंबर, 2005 के नोट में अंतरिक्ष आयोग या कैबिनेट में इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी। उक्त नोट में सहमति के तहत बनाये जाने वाले जीसैट-6 उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए अनुमति मांगी गयी थी। जीसैट-6ए उपग्रह के लिए अंतरिक्ष आयोग से मंजूरी पत्र मांगते समय भी सौदे का खुलासा नहीं किया गया।