चेहरा बुर्के के पीछे, पर डिज़ाइन करती हैं बीचवेयर

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Face the back of Burke, that the design Bichveyr Face the back of Burke, that the design Bichveyr ट्रडिशनल मुस्लिम स्कार्फ़ पहनने वाली 18 साल की फरमाना शेख़ ने कभी भी बीच (समुद्र का किनारा) के दर्शन नहीं किए, लेकिन ताज्जुब है कि वह रंगीन बिकीनी और बीचवेयर डिज़ाइन करती हैं। फरमाना फैशन डिज़ाइनिंग सीख रही हैं और कहती हैं...'ये फैशन के सेंस और मजबूत इरादों की बात है। मैं आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं।'

फैशन ऐंड स्टाइल की पढ़ाई कर आत्मनिर्भर बनने की चाह रखने वाली फरमाना अकेली मुस्लिम लड़की नहीं हैं। अहमदाबाद की सुन्नी वक्फ़ कमिटी द्वारा चलाए जाने वाले सुल्तान अहमद इंस्टिट्यूट ऑफ फैशन डिज़ाइन ( SAIF) में कई मुसलमान लड़कियां फैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स कर रही हैं। साल 2002 तक इस इंस्टिट्यूट के अलग-अलग कोर्सेस में कुछ ही स्टूडेंट्स थे। लेकिन, गोधरा कांड के बाद अचानक कंप्यूटर की शिक्षा लेने वालों, स्पोकन इंग्लिश सीखने वालों और फैशन डिजा़इनिंग की तालीम लेने वालों की संख्या में खासा उछाल आया। कम्यूनिटी में स्किल अपग्रेड करने की जरूरत परवान चढ़ी और खुद को मुख्यधारा में खींच लाने की जिद्द भी दिखाई देने लगी।

दंगों के दौरान कई लोगों को नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। कुछ बहादुर महिलाओं ने नए गुण सीखकर अपनी पारिवारिक आय में इज़ाफा करना शुरू कर दिया। बुर्के में अपना चेहरा छुपाए रखने वाली 19 साल की फ़ारुखी नसीमा चोली और डिज़ाइनर साड़ियों के लेटेस्ट वर्ज़न में स्पेशलाइज़ेशन हासिल कर रही हैं।

इस्टिट्यूट की एक और स्टूडेंट 17 साल की मैमन अक्सा क्रोशे बीचवेयर की डिज़ाइनिंग में जुटी हुई हैं जिसके हैट और शूज़ भी होंगे। मैमन ने कहा, 'ब्राइडल ऐंड ट्रडिशनल वेयर का एक असाइनमेंट करते हुए महसूस हुआ कि मुझे साड़ियों पर एक्स्पेरिमेंट करने में मज़ा आता है। मैंने जिराफ प्रिंट की शिफॉन साड़ी डिज़ाइन की है जिसके साथ बैकलेस-स्लीवलेस चोली है।' उन्होंने कहा,'हम इन क्रिएशन्स को बढ़िया दाम पर बेचकर अपने परिवार की मदद करना चाहते हैं।'

इंस्टिट्यूट के एमडी रईस मुंशी ने कहा, 'हमारा मकसद इन स्टूडेंट्स को आत्मनिर्भर बनाना है। साल 2002 के बाद मुसलमान बेरोजगारी अपने चरम पर पहुंच गई। कई युवा मुसलमानों पर अपनी जीविका कमाने के लिए नई प्रफ़ेशनल स्किल्स विकसित करने का दबाव बना।'

गुजरात दंगों के बाद इंस्टिट्यूट में लड़कों की संख्या 50 पर्सेंट बढ़ी और लड़कियों की संख्या में 30 पर्सेंट का उछाल दर्ज हुआ।