भारत के असली रत्न

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India likely to win the series ended: Gavskrr Metromnनई दिल्लीः दिल्ली का नक्शा बदल देने वाले इस शख्सियत को दिल्ली वाले हमेशा अपने दिल में रखेंगे और शायद ही कभी भूल पाएंगे। हम बात कर रहे हैं एक ऐसे कर्मयोगी की जिसने अपनी बुद्धि, विवेक और दूरदर्शिता से दिल्ली को दुनिया के एक बेहद मॉडर्न शहर में बदल दिया।

जी हां, यह और कोई नहीं भारत के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियर ई श्रीधरण हैं जिन्हें सारी दुनिया मेट्रोमन के नाम से जानती है। उन्होंने भारत में रेल निर्माण का चेहरा बदल दिया। उनकी देख रेख में बनी दिल्ली मेट्रो दुनिया की बेस्ट मेट्रो मानी जाती है और उसे देखने सारी दुनिया से लोग आते हैं। दिल्ली मेट्रो आज निर्माण का एक नया मानदंड है और उससे सारे निर्माणों की तुलना की जाती है।

उनकी देखरेख में डीएमआरसी एक ऐसा संगठन बन गया जिसका सानी नहीं है। आज वही श्रीधरण 79 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत हो रहे हैं। ई श्रीधरण की कड़ी मेहनत, ईमानदारी और लगन का यह नतीजा है कि दिल्ली मेट्रो पर हर भारतीय को गर्व है। इसके सभी चरणों पर काम पूरा हो जाने के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मेट्रो सिस्टम होगा। इतना ही नहीं यह दुनिया की सबसे सुरक्षित ट्रांसपोर्ट सेवा है।

ई श्रीधरण बेहद सादगी से जीवन जीने वालों में हैं और दूसरों की सेवा उनके जीवन का मिशन है। वह डीएमआरसी के प्रबंध निदेशक के पद पर रहे तो लेकिन उन्होंने वेतन के तौर पर सिर्फ एक रुपया महीना लिया। यह है उनका बड़प्पन। वह पब्लिसिटी के भूखे नहीं है और इसलिए हमेशा मीडिया की चमक से दूर रहते हैं।

अपनी निजी जिंदगी के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि उनका जीवन बड़े अनुशासन का है और उनके सुबह उठने से लेकर सोने तक का समय तय है। उनकी फिटनेस का राज दक्षिण भारतीय सादा भोजन और योग है। बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि आर श्रीधरण पिछली सदी की दुनिया की सबसे बड़ी रेल परियोजना कोंकण रेल के भी प्रणेता रहे हैं।

कोंकण रेल दो हजार पुलों और 91 सुरंगों के बीच गुजरती है। वह पूरी दुर्गम परियोजना उनकी देखरेख में पूरी हुई और उसके लिए उन्होंने भारत के पश्चिमी घाटों में खुद कैंप लगाकर समयबद्ध ढंग से काम करवाया। वे बियावान जंगलों में खुद रहकर निर्माण का काम देखते और वहां की मुश्किलें आसान करते। एक सच्चे कर्मयोगी की तरह उन्होंने कामगारों, इंजीनियरों के साथ कंधे से कंधा लगाकर काम किया जिसका परिणाम कोंकण रेल के रूप में सामने आया।

वे यहां चुपचाप काम करते थे और हर छोटी बड़ी समस्या का समाधान करते थे। ई श्रीधरण जैसे लोग देश में बहुत कम हैं। शायद उंगलियों पर गिने जा सकें। भारत को उन पर उतना ही गर्व होना चाहिए जितना सचिन तेंदुलकर पर है। ऐसे लोगों को सम्मान देकर हम अपना ही सिर ऊंचा कर सकेंगे।