अंधकार से प्रकाश की ओर...

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From darkness to light शहरों की चकाचौंध रातों के बीच गांव की घुप्प अंधेरी रातों में ज़िंदगी आज भी जगमगाती नहीं टिमटिमाती है.

लेकिन इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि भारत के हज़ारों गांव बिजली की पहुंच से दूर हैं और लोगों के पास अपनी ज़रूरतों के लिए भी ये सुविधा उपलब्ध नहीं है.

गांव की इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए बिहार के कुछ नौजवान इक्कठा हुए और एक ऐसा तरीका इजाद किया जिसमें मुनाफ़ा भी है और समाज सेवा भी.

'' मेरा नाम रत्नेश यादव है और अपनी इस रिपोर्ट के ज़रिये मैं आपको बताना चाहता हूँ की मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर 'बायोमास' के ज़रिए किस तरह बिहार के कई सौ गाँव को रोशन किया है.

मेरा जन्म बिहार में हुआ लेकिन पढ़ाई-लिखाई के लिए बचपन में ही मैं नैनिताल चला गया. कई साल बाद परिवार की ज़िम्मेदारियां मुझे अपने गांव खींच लाईं, लेकिन गांव लौटकर पहली बार मुझे भारत की दो तस्वीरों का फर्क महसूस हुआ.

साल 2003 में जब मैं बिहार आया तो यहां आकर मुझे एहसास हुआ कि शहरों में हम जिस बिजली को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मान लेते हैं वो गांव के लिए आज भी कितना बड़ा सपना है.

अंधकार में डूबे गांव

पटना से बाहर निकलते ही मानो बिहार अंधेरे में डूब जाता था. रात को तो ज़िंदगी पूरी तरह ठहर जाती थी. ऐसे में मैंने तय किया कि मैं इस इलाके के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में काम करूंगा.

अंधकार में डूबे इन गांव और कस्बों तक रोशनी पहुंचाने के लिए मैंने अपने कुछ साथियों से भी बातचीत की और मेरे साथ जुड़े स्कूल के दिनों के मेरे साथी ग्यानेश पांडेय.

हम लोगों को एक ऐसी तकनीक की तलाश थी जो सस्ती हो, किफ़ायती हो और गांव की व्यवस्था से मेल खाए. हमने बिजली बनाने और उसके लिए 'बायोमास गैसिफ़िकेशन' की तकनीक का इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया.

ये एक ऐसी तकनीक है जिसमें ईंधन के तौर पर बायोमास का इस्तेमाल किया जाता है और उससे पैदा हुई गैस को जलाकर बिजली बनाई जा सकती है.

ये इलाका धान की खेती के लिए मशहूर है और खेती के बाद कचरे के रुप में धान की भूसी इस इलाके में बहुतायत में मौजूद थी.

ऐसे में हमने ईंधन के तौर पर धान की भूसी का ही इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया. हमने अपनी इस परियोजना को ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ का नाम दिया.

लालटेन और ढिबरी की रोशनी में जी रहे गांववालों को एकाएक इस नए तरीके पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आधी से भी कम कीमत पर मिल रही बिजली की सुविधा को वो ज़्यादा दिन तक नकार नहीं सके.

आमतौर पर गांव में हर घर दो से तीन घंटे लालटेन या ढिबरी जलाने के लिए कैरोसीन तेल पर 120 से 150 रुपए खर्च करता है.

ऐसे में ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ के ज़रिए हमने गांववालों को 100 रुपए महीना पर छह घंटे रोज़ के लिए दो सीएफएल जलाने की सुविधा दी

आखिरकार साल 2007 को ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ की पहली कोशिश क़ामयाब हुई. हमने बिहार के ‘तमकुआ’ गांव में धान की भूसी से बिजली पैदा करने का पहला प्लांट लगया और गांव तक रौशनी पहुंचाई.

संयोग से ‘तमकुआ’ का मतलब होता है 'अंधकार भरा कोहरा' और इस तरह 15 अगस्त 2007 को भारत की आज़ादी की 60वीं वर्षगांठ पर हमने ‘तमकुआ’ को उसके अंधेरे से आज़ादी दिलाई.

कचरे से बिजली.

कुलमिलाकर अपनी इस कोशिश के ज़रिए हमने गांव में बहुतायत में मौजूद एक बेकार सी चीज़ का नायाब इस्तेमाल ढूंढ निकाला.

यही नहीं ईंधन के रुप में इस्तेमाल के बाद बचे भूसे की राख से महिलाएं अगरबत्तियां बनाती हैं और हर दिन का 60 रुपए तक कमा लेती हैं.

साथ ही 'हस्क पावर सिस्टम' के ज़रिए स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिल रहा है क्योंकि प्लांट का सारा काम स्थानीय लोग और गांववाले ही करते हैं.

बिजली ने कई मायने में तमकुआ के लोगों की ज़िंदगी बदल दी है. छठी कक्षा में पढ़ने वाला हरेश कहता है, ''पहले गांवभर में लोग आठ बजते-बजते सो जाते थे. रात को सांप-बिच्छु का डर रहता था और चोरियां भी हो जाती थीं. बिजली आने के बाद ऐसा नहीं होता. अब हमें तेल खत्म होने पर पढ़ाई रोकने का डर भी नहीं है. हम जब चाहे पढ़ सकते हैं.''

हमारी इस कोशिश को व्यापार और समाजसेवा की एक नायाब कोशिश के रुप में पहचान देने के लिए साल 2011 में हमें 'एशडेन पुरस्कार' से भी नवाज़ा गया. मेरा और मेरे साथियों का मानना है कि ये बदलाव सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहना चाहिए.

भारत में सिर्फ धान के भूसे से 27 गीगा-वॉट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता है. उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में बड़े स्तर पर धान की खेती होती है और कचरे के रुप में धान की भूसी निकलती है. इन सभी राज्यों मे इसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है.

हमारा लक्ष्य है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय...' यानि अंधकार से प्रकाश की ओर और हम अपनी इस कोशिश को अंधेरे में डूबे भारत के हर गांव तक पहुंचना चाहते हैं.''