राजनाथ सिंह सूर्य. एक पत्रकार, स्तम्भकार और राजनेता भी. पत्रकारिता सहित समाज के सभी क्षेत्रों पर मजबूत पकड़. बेहद गरीब परिवार से निकल कर देश के सबसे बडे़ सदन तक का सफर कर चुके राजनाथ भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ हैं. कभी आरएसएस का पूर्णकालिक सदस्य रहे राजनाथ आज भी खुद को उसका कार्यकर्ता मानते हैं. अपनी बेबाकी के कारण राजनाथ सिंह सूर्य ने काफी मुश्किलें भी उठाई हैं, पार्टी-संगठन के अंदर-बाहर. यही कारण है कि कभी राज्य सभा में भाजपा की आवाज बुलंद करने वाले राजनाथ पार्टीराजनाथ सिंह सूर्य. एक पत्रकार, स्तम्भकार और राजनेता भी. पत्रकारिता सहित समाज के सभी क्षेत्रों पर मजबूत पकड़. बेहद गरीब परिवार से निकल कर देश के सबसे बडे़ सदन तक का सफर कर चुके राजनाथ भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ हैं. कभी आरएसएस का पूर्णकालिक सदस्य रहे राजनाथ आज भी खुद को उसका कार्यकर्ता मानते हैं. अपनी बेबाकी के कारण राजनाथ सिंह सूर्य ने काफी मुश्किलें भी उठाई हैं, पार्टी-संगठन के अंदर-बाहर. यही कारण है कि कभी राज्य सभा में भाजपा की आवाज बुलंद करने वाले राजनाथ पार्टी के लिए अब खास महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं. उनका कहना है कि आज कल अपने को फिट रखने में लगा हूं कि शायद कभी काम आ जाऊं.
जीवन के शुरुआती दिनों के बारे में बताएं.
अयोध्या के पास के एक गांव जनौरा में एक साधारण किसान परिवार में ८ मई १९३७ को मेरा जन्म हुआ. मेरे पिता का नाम शिव नारायण सिंह और माता का नाम श्रीमती सुधा सिंह है. सन १९४८ की बात है जब गांधी जी की हत्या हुई थी और संघ पर बैन लग गया था. मेरे बड़े भाई सत्याग्रह करते जेल चले गये. वे उस समय हाईस्कूल में पढ़ रहे थे. गांव के बड़े बूढ़े मुझे पकड़कर पिटावाते थे कि इसका भाई गांधी जी का हत्यारा है. जब भाई साहब जेल से छूटकर आये तो मैं भी उनके साथ संघ की शाखाओं में जाने लगा. वहीं मेरा उद्धार हो गया. पढ़ लिख भी गया. मैंने हाईस्कूल तक गांव में और फिर ग्रेजुएशन फैजाबाद के डिग्री कालेज से किया. बाद में एमए करने के लिए लखनऊ चला गया.
लखनऊ में यूनिवर्सिटी देखा घूमा तो मुझे लगा कि लखनऊ रहने लायक जगह नहीं है. चूकि मैं एनशियेंट हिस्ट्री में एमए करना चाहता था. इसलिए इलाहाबाद विवि चला गया. लेकिन वहां देर हो चुकी थी और जो वहां का अच्छा स्टाफ था वह गोरखपुर विवि चला गया था. तो मैं भी गोरखपुर चला गया. वहीं से एमए किया. उसके बाद वहीं मैं संघ का प्रचारक हो गया. उन दिनों कानपुर में आरएसएस का शिविर लगा था. उसी शिविर में भाऊराव देवरस जी की मुझ पर निगाह पड़ी और उन्होंने मुझसे संघ का काम करने को कहा. मैं उसे भगवान की कृपा ही मानता हूं.
करियर के बारे में?
संघ से मुझे पत्रकारिता में भेजा गया था. १९६३ में सबसे पहले 'हिन्दुस्तान समाचार' में फिर वहां से ६५ में 'आज' में आ गया. वहां मैंने लगभग पन्द्रह सोलह साल काम किया. सन १९७० में चौधरी चरण सिंह जी चीफ मिनीस्टर हुए थे तो उनका दबाव था कि मेरा लखनऊ से कहीं और ट्रांसफर कर दिया जाय. मैनेजमेंट ने मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि अगर मेरी जरूरत हो तो करिए, अगर राजनीतिक दबाव में करेंगे तो मैं नहीं आऊंगा. मैनेजमेंट का कहना था कि आपका ट्रांसफर अभी कर देते हैं फिर चौधरी साहब के हटते ही आपको बुला लेंगे. मैं नहीं माना और त्यागपत्र दे दिया. फिर फ्रीलांसिंग करता रहा. बाद में जब ७४ में कानपुर से 'आज' का प्रकाशन शुरु हुआ तो लखनऊ आफिस के लिए उन्हें मुझे फिर बुलाना पड़ा क्योंकि उन्हें कोई बढ़िया आदमी नहीं मिल पा रहा था. तब से लेकर १९८८ तक मैं ब्यूरो चीफ के तौर पर काम करता रहा.
उस समय तक कई मामलों में मालिकों का दबाव बढ़ने लगा तो उब कर मैंने 'आज' से त्यागपत्र दे दिया. उसके बाद पांच छह महीने दैनिक जागरण में रहा तभी स्वतंत्र भारत में संपादक बनने का ऑफर मिला तो मैं वहां चला गया. १९९१ में उत्तर प्रदेश में जब भाजपा की सरकार बनी तो सभी मंत्री बन गये, कोई पार्टी का काम करने वाला नहीं था. तब जिन्होंने मुझे पत्रकारिता में भेजा था (भाऊराव देवरस) ने कहा कि तुम अब पत्रकारिता छोड़ो और पार्टी का काम देखो.
मुझे पार्टी में महामंत्री बना दिया गया और मैं पार्टी का काम करने लगा. लेकिन पत्रकारिता में जो २५-२६ साल गुजरे, उसमें नाक जरा ऊंची हो गई थी. क्योंकि तब मंत्री, मुख्यमंत्री और विधायकों का घर पर आना जाना था. तो मैं भी गर्व में रहता था कि पहले जैसी ही स्थिति है. इसलिए मैं पार्टी में भी वैसा ही व्यवहार करता था. किसी को कुछ कह देना, टोक देना, ये सब पत्रकारिता की आदत और संघ के संस्कार थे कि मैं गलत बात बर्दाश्त नहीं कर सकता था. एक बार बाजपेयी जी ने भी मुझे टोका था कि जरा चुप रहा करो, कम बोला करो. नतीजा ये हुआ कि मुझे पार्टी से किनारे कर दिया गया.
पता नहीं कब, क्यों, हमको समझ में नहीं आया, १९९६ में मुझे राज्यसभा में भेज दिया. उसके लिए पार्टी में मैंने न टिकट मांगा था न ही किसी से मिला था. अच्छा ही हुआ छह वहां साल बीत गया. सबसे फायदा ये हुआ कि उससे एक्सपोजर बहुत अच्छा मिला.
पत्रकारिता में जाते वक्त और उसे छोड़ते वक्त कैसा फर्क देखा आपने?
एक बहुत बड़ा अंतर आ गया. पहले संपादक का महत्व था अब नहीं है. अब मैनेजमेंट का महत्व हो गया है. पहले मैं जिस अखबार 'आज' में था उसके मालिक संस्थापक शिवप्रसाद गुप्त एक बार अपने संपादकीय विभाग में चले गये तो वहां सभी लोग खड़े हो गये. यह देखकर वे रोने लगे. बोले- मेरे जैसे मूर्ख आदमी को देखकर आप लोग खड़े हो गये. मैं अब कभी नहीं आऊंगा. और, वे कभी नहीं गये.
जब मैं भी संपादक था, उस समय किसी अफसर के खिलाफ छप गया था तो मुझे जयपुरिया ने चाय पर बुलाया और कहा कि भाई इन लोगों ने हमारे परिवार के लिए बहुत किया है और उन्हीं के खिलाफ खबर छप रही है. मैंने कहा करेस्पांडेंट को और मुझे क्या पता कि किसने आपके परिवार के लिए क्या किया है. आप एक लिस्ट दे दीजिए उन अफसरों की. मैं अपने रिपोर्टरों को दे दूंगा. बोले- अच्छा काफी पीजिए और जाइए. तब प्रोपराइटर भी इस स्थिति तक थे.
अब प्रोपराइटर भी बदल गये. पत्रकारिता में भी धंधा करने वालों का वर्चस्व हो गया है. अब देखिए लखनऊ के दोनों पत्रकार सघों उपजा और आइएफडब्लूजे के जितने कर्ताधर्ता हैं उनमें किसी का पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं. प्रेस क्लब है, वहां किसका कब्जा है, क्या क्या होता है सबको पता है. आजकल ये सब बहुत हो गया है. उसका कारण है कि मैनेजमेंट पत्रकारों से लाइजनिंग कराता है.
एक बछावत पे कमीशन बना था. डा. मनमोहन सिंह भी उसके मेंबर थे. वे सभी दफ्तरों में खुद ही आकर पत्रकारों से जुड़ी जानकारी लेते. स्वतंत्र भारत में मेरे आफिस भी आये, उन्होंने जिलों के पार्ट टाइम पत्रकारों के बारे में पूछा कि कैसे रखते हैं और कैसे पेमेंट करते हैं. मैंने ]उन्हें बताया कि हम जिलों में अध्यापक या वकील को रखते हैं क्योंकि वे समाज में प्रतिष्ठित व सूचना के केन्द्र भी होते हैं. उनको खास पेमेंट का सिस्टम नहीं है.
मनमोहन सिंह ने कहा कि मैं १/३ पे रिकमेंड करूंगा. मैंने कहा कि ऐसा मत किजिएगा नहीं तो फिर लोग काम नहीं करेंगे. अखबार भी ऐसे नहीं हैं कि उतना पेमेंट दे सकें. फिर जिलों में पत्रकार भी नहीं मिलेंगे. लेकिन कमीशन के जाते ही सबसे पहले नव भारत टाइम्स ने कांट्रैक्ट पर रखना शुरू कर दिया. नतीजा ये हुआ कि कांट्रीब्यूशन की जगह कांट्रैक्चुअल सिस्टम चालू हो गया.
आपके समय न्यूज चैनलों का बोलबाला नहीं था, क्या आपको लगता है कि चैनलों ने इस क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया है?
हम लोग जब लिखते थे तो एक भी गलत शब्द न लिखने के लिए संपादक हमें प्रशिक्षित करते थे. अब शब्द संयोजन, वाक्य विन्यास, व्याकरण का कोई ध्यान नहीं है. भाषा की शुद्धता की कोई जगह नहीं है. कान्वेंट से निकलने वाले पत्रकार चैनल पर अनाप-शनाप सवाल-जवाब करते हैं. सारे चैनल एक ही न्यूज को दिखाते हैं और कहते हैं सबसे पहले हम ही दिखा रहे हैं. ये सब मार्केटिंग हो गया है.
प्रिंट मीडिया को विजुअल मीडिया कैसे प्रभावित कर रहा है?
समय के हिसाब से परिवर्तन तो होना ही है. विजुअल का असर प्रिंट पर पड़ा है. आज चले चाहे न चले अखबारों में कलेवर और डिजाइन पर फोकस होता है. भाषा का भी आग्रह नहीं रहा. यह उसी तरह है जैसे राजनीति में सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी का अक्स अन्य सभी दलों में दिखता है.
पेड न्यूज पर आप क्या कहेंगे? यह किस तरह चौथे खम्भे पर असर कर रहा है?
पिछले चुनाव की घोषणा के समय मैं बलिया में था. मुझे आश्चर्य हुआ कि एक प्रत्याशी ने कहा- मुसीबत है, हमको पैकेज देना पड़ेगा. पूछने पर उन्होंने बताया कि हर चुनाव में पत्रकारों को पैकेज देना पड़ता है. पेड न्यूज भी तो विज्ञापन ही है. करप्शन इतना नीचे तक घर कर गया है कि जो नहीं इन्वाल्व होगा, वह आउट आफ डेट हो जाएगा. तो चौथे खम्भे के लोग कोई बाहर से तो आये नहीं हैं. ''जैसी जग की रीत, वैसी उठावे अपनी भीत'' वाली बात है.
आपको कभी पेड न्यूज करना पड़ा?
नहीं, कभी नहीं. हां उन दिनों लिफाफे देने का प्रचलन था. हेमवती नंदन बहुगुणा इसके लिए बदनाम थे. मेरा जब उनसे कंफ्लीक्ट हुआ तो उन्होंने मेरे मित्र और सरकार में मंत्री राजमंगल पांडेय से कहा कि आपके साथ राजनाथ सिंह रोज बैठते हैं और मेरे खिलाफ लिखते हैं. तो उन्होंने कहाकि आप तो उन्हीं लोगों को पत्रकार समझते हैं जिन्हें लिफाफा देते हैं. राजनाथ उन पत्रकारों में से नहीं हैं. तो कुल मिलाकर थोड़ा बहुत ये सब था लेकिन आज की तरह वीभत्स नहीं था. मैं खुद प्रेस कान्फ्रेंस कमेटी का अध्यक्ष, मंत्री रहा तो हम लोग प्रेस कान्फ्रेंस प्रेस रूम में ही करते थे और केवल बिस्किट और चाय होती थी. सबको वहां आना पड़ता था. चाहे कितना बड़ा नेता हो.
अपने संसदीय अनुभव बताइए, एक पत्रकार की नजर में संसद का क्या अनुभव रहा?
पत्रकारिता के दिनों में कार्यवाही होते देखता था. अब तो संसद चलती ही नहीं है. राजनीतिक भाव से प्रेरित होकर वहां काम होता है. पहले विरोधियों की भी अच्छी सलाह को माना जाता था. विरोधियों के भाषणों को भी सराहा जाता था. पहली बार जब अटल जी संसद में बोले तो नेहरूजी ने सराहा. अब सकारात्मकता नहीं रही वहां.
हाल में हुए अन्ना के आन्दोलन को संसद के लिए चुनौती मानते हैं?
संसद को तो उसके सदस्य ही चुनौती दे रहे हैं. खुद ही नहीं चलने देते. ये भी कोई संसद है जहां किसी भी गंभीर विषय पर विचार नहीं होता. निष्ठा वाली राजनीति नहीं रही. संसद कोई सार्थक काम नहीं कर रही. ऐसे में उसका अस्तित्व ऐसा हो चुका है कि आगे और भी वीभत्स टिप्पणियां होंगी. आज किसी नेता के पीछे कोई युवा क्यों नहीं चल रहा? क्योंकि नेताओं की कथनी व करनी में अन्तर है. लोहिया और जेपी जैसे लोग अब कहां हैं. सामाजिक परिवर्तन होता रहता है और हो रहा है.
जैसाकि मीडिया पर अंकुश लगाने की बातें उठ रही हैं तो आपको लगता है कि ऐसा वक्त आ गया है?
अंकुश क्या होता है. तमाम कानून बने हैं देश में, उसके अनुसार मीडिया हो या कोई और उलंघन करने पर कार्रवाई हो. ये सब लफ्फाजी है और कुछ नहीं. क्या अंकुश इसलिए चाहिए क्योंकि मीडिया आज बहुत कुछ एक्सपोज कर रहा है. दरअसल मार्केटिंग हावी हो गई है. इससे संपादकीय नष्ट हो रहा है.
संसदीय कार्यकाल के बाद की राजनीतिक सक्रियता कैसी है?
बिलकुल नहीं रही. मैं (हंसते हुए) आज की राजनीति में अनफिट हूं. आज की राजनीति ऐसी है कि या तो आपके पास धनबल हो या फिर परिक्रमा करने में आप माहिर हों तो सफल होंगे. पत्रकारिता की बदौलत और संघ के संस्कार की वजह से मैं ये सब नहीं कर सकता. स्वाभिमान कुछ ज्यादा हो गया है मुझे.
पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वाली भाजपा में भी ऐसा ही है? अब आप पार्टी में नहीं दिखते?
जब मैं नहीं सक्रिय नहीं हूं तो क्या जवाब दूं. वहां भी है ही. राजनाथ सिंह जब राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तो उन्होंने अपने बेटे को युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. मैंने विरोध किया तो मुझे पीछे धकेलने का काम किया गया. मुझे कहीं बुलाया नहीं जाता. जो पार्टी के प्रत्याशियों को हराते हैं उन्हें तवज्जो दी जाती है. तो ऐसी जगह मेरी क्या जरूरत. बस स्वांता सुखाय के लिखता रहता हूं.
संघ का स्वयंसेवक होते हुए पत्रकारिता से कैसे न्याय कर पाते थे?
हमारी विचारधारा का प्रभाव आर्टिकल में भले दिखता है लेकिन न्यूज में हमेशा निष्पक्ष रहा. जब मैं स्वतंत्र भारत का संपादक था तो मैंने मोहन सिंह से कहाकि समाजवादी विचारधारा पर लिखिए. एक गुरु प्रसाद कम्यूनिस्ट विचार के थे उनसे भी लिखवाया. समाचार में हमेशा निष्पक्ष रहा.
२०१२ के यूपी चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन के बारे में आपकी क्या राय है?
मुझे निश्चित लगता है कि सपा पहले स्थान पर रहेगी. दूसरे स्थान पर बसपा, कांग्रेस व भाजपा में कोई भी हो सकता है. वजह, भाजपा में व्यक्तिगत अहंकार का टकराव बहुत है. कोई अपने पीए को भी टिकट दिलवा देता है चाहे उसकी जमानत जब्त हो जाये और हाईकमान मान जाता है. गड़करी जी उतने जानकार नहीं हैं. जब उमा भारती को लाया गया तो कई तरह के बयान दिये गये.
सब जानते हैं कि ६०-७० सीट से ज्यादा नहीं मिलेगी और मुख्यमंत्री के दावेदार सभी बन रहे हैं. दीन दयाल उपाध्याय जी ने लिखा है अपनी किताब में कि जिस दिन मैं देखूंगा कि जनसंघ अपने रास्ते से पथभ्रष्ट हो गया है, उसी दिन इस पार्टी को भंग कर दूंगा. तो आज वह स्थिति आ गई है कि पार्टी को भंग कर दिया जाय.
आप संघ के पूर्णकालिक सदस्य रहे हैं, क्या आपको लगता है कि अब संघ की भाजपा पर पकड़ ढीली हो गई है?
इसके दो कारण हैं. पहला, संघ ने अपने समाजिक क्षेत्रों में कार्य का दायरा बढ़ा दिया है. बनवासी, मलिन बस्तियों सहित सौ से अधिक क्षेत्रों में संघ सक्रिय है. दूसरा, संघ में जो पीढ़ी है वह भाजपा की पीढ़ी से जूनियर है. जब तक भाऊराव जैसे सीनीयर लोग थे तो किसी की हिम्मत नहीं होती थी भटकने की. पार्टी द्वारा चुनाव के समय शाखाओं को लगाया जाता है और चुनाव बाद जब समाज का कोई काम लेकर संघ के लोग जाते हैं तो लोग मिलते तक नहीं. इससे क्लेश होता है. लेकिन संघ की विचारधारा बढ़ रही है. बाबा रामदेव, अन्ना हजारे या श्री श्री रविशंकर जैसे लोग संघ के राष्ट्रवाद व आध्यात्मिक विचारों को बढ़ा रहे हैं. हां यह है कि संघ की शाखाएं कमजोर हो गई हैं.
सामाजिक और राजनीतिक सुधारों में क्या ज्यादा जरूरी है?
सामाजिक सुधार पर ही सबकुछ निर्भर है. इतिहास देखिए हमारे यहां राजा ने कोई सुधार नहीं किया. साधु संतो व ऋषियों ने सामाजिक सुधार किये हैं. वो परंपरा है, जहां मोह नहीं है. राजनीति में पर हमारे अंदर मोह पैदा हो जाता है. गुलामी के दिनों में भी समाज की अपनी रीति रिवाज थी. दयानंद, स्वामी विवेका नंद, गांधी जी जैसे लोगों ने समाज को जिन्दा रखा. उनकी प्रतिष्ठा उस समय भी रही. समाज पर राज्य कभी प्रभावी नहीं रहा. समाज की प्रवृत्ति ठीक होनी चाहिए.
अपनी अध्ययनशीलता के विषय में हमें बताएं, किन विषयों में रूचि है?
ऐसा है कि मैं बड़ों के सत्संग में रहा. पत्रकार के रूप में स्वंय सेवक के तौर पर भी. संग के दूसरे गुरुजी (गोलवरकर जी) का मेरे जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा. जब भी वे लखनऊ आते तो उनके साथ रहने का अवसर मिलता था. दीन दयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, अटल जी के साथ बैठता था. डॉ लोहिया आते थे तो उनके साथ काफी गपशप होती थी. मित्रभाव से बात करते थे. मैं मुखरित होता हूं जिन चीजों के बारे में वह सत्संग का ही असर है. मैंने कोई ग्रन्थ नहीं पढ़े.
आपने कुछ किताबें भी लिखी हैं?
किताब नहीं लिखी. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरे जो स्तम्भ प्रकाशित हुए थे उन्हीं के तीन वाल्यूम प्रकाशित हुए हैं.
इन दिनों किसी खास मिशन में लगे हैं या पूरी तरह आराम कर रहे हैं ?
कई काम हैं. लखनऊ से सटे मोहनलाल गंज के पास बिन्दौआ गांव में बनवासी कल्याण आश्रम चला रहा हूं जिसमें बनवासी क्षेत्रों के बच्चों को लाकर रखा जाता है और विभिन्न स्कूलों में उन्हें पढ़ाया जाता है. वहीं एक कुष्ठ आश्रम भी चला रहा हूं. ये संघ का ही कार्य है लेकिन लखनऊ में मैं ही देख रहा हूं. इसके अलावा कई सामाजिक संस्थाओं में अध्यक्ष व मंत्री हूं. हिमालय सुरक्षा समिति व सीमा जागरण मंच में भी सक्रिय हूं.
ऐसी कोई बात जो बताना चाहेंगे या कोई भड़ास?
हम तो पॉजिटीव सोच वाले हैं और उसी का प्रयत्न करते हैं. आत्मा से कभी गलत स्वर नहीं निकलता. बुद्धि से जरूर निकल जाता है. बुद्ध ने भी अत्त दीपो भव अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो. समाज में ऐसा ही भाव पैदा करने की कोशिश करता हूं. काहे को किसी पर चर्चा करना अपने भीतर झांकिए बस. बचपन में दादी ने कहा था कि कुत्ता भी जहां बैठता है झाड़ लेता है. वही बात आज भी संज्ञान में है कि अपनी धरती स्वच्छ रखिए जहां भी रहिए. प्रतियोगिता का कोई अंत नहीं है. जैसे मैं राजनीति में नहीं तो सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हूं. उससे आत्मिक संतुष्टि मिलती है.
कोई ऐसा सपना जो लगता है कि पूरा नहीं हो सका?
मैंने कोई सपना नहीं देखा. जब मैं पत्रकार था तब कल्पना नहीं किया था कि संपादक बनूंगा. स्वतंत्र भारत में मुझे बुलाया गया तो लगा कि ब्यूरो चीफ बनाएंगे. लेकिन संपादक का ऑफर मिल गया. कभी सोचा नहीं लखनऊ में मकान होगा. पांच छह बार एलाटमेंट हुआ लेकिन पैसे ही नहीं थे कि रजिस्ट्री कराता तो सरेंडर कर देता. एक बार मित्रों ने कहाकि सड़क पर चंदा मांग कर हमलोग आपकी रजिस्ट्री कराएंगे तब स्कूटर बेचकर मकान की रजिस्ट्री कराया. सब भगवान की कृपा ही है कि जिसकी कल्पना नहीं की वो मिलता चला गया.
कोई जानकारी जो आपके बारे में नई पीढ़ी को नहीं पता?
मुझे लोग मॉनिंग वॉक वाला जर्नलिस्ट कहते थे. मेरी आदत पुरानी है, सवेरे मैं कालिदास मार्ग और माल एवेन्यू में टहलता था. जैसी मेरी ख्याति थी पत्रकारिता की तो लोग इंतजार करते रहते थे खबरें बताने के लिए. इसलिए जब तक शाम तक खबर बने मैं दोपहर को ही खबर भेजकर खाली हो जाता था. मेरा नाम ही लोगों ने रखा था वो मॉर्निंग वॉक वाले राजनाथ सिंह. वह आदत आज भी है टहलता हूं ताकि फिट रहूं. शायद कभी मेरी जरूरत पड़ जाये!
आपने अपने नाम में सूर्य शब्द क्यों जोड़ा?
सन ९६ में जब राज्य सभा में गया तो दूसरे राजनाथ सिंह भी राज्यसभा में थे. विपक्ष में थे हमलोग. वहां जब नाम पुकारा जाता था तो भ्रम हो जाता था. तब मेरे बड़े भाई साहब ने कहा कि तुम सूर्य लिखो. क्यों कि हम सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं. यही रीजन था और कोई नहीं. यह कोई उपनाम नहीं है.
परिवार के विषय में?
हमारे तीन बच्चे हैं. एक बेटी और दो बेटे हैं. बड़ा बेटा प्राइवेट नौकरी में है छोटे का अपना बिजनेस है.
आपने प्रेम विवाह किया था?
अरे नहीं बाल विवाह किया था. (हंसते हुए) मैं तो भाग गया था घर से. लेकिन संघ वालों ने पकड़ कर घर भेजा कि बड़ा भाई तो संघ में है ही. इसकी शादी नहीं हुई तो पूरा घर संघ विरोधी हो जाएगा. के लिए अब खास महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं. उनका कहना है कि आज कल अपने को फिट रखने में लगा हूं कि शायद कभी काम आ जाऊं.


