भट्ट साहब के पैर छुए

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Mr Bhatt's feet touchedइस वर्ष गाडरवारा में दद्दाजी का 55वां सवा करोड़ शिवलिंग निर्माण महारुद्राभिषेक समारोह संपन्न हुआ है, जो 4 नवंबर से 10 नवंबर तक चला। कार्यक्रम में फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने कलाकार श्री राजपाल यादव भी शिवलिंग निर्माण करते देख गए। कार्यक्रम में हर बार की तरह अपनी मजबूत भागीदारी निभाने आए बॉलीवुड एक्टर आशुतोष राणा के साथ बातचीत के कुछ अंश।

10 नवंबर को आपका जन्मदिन था और इसी दिन आपके परमपूज्य गुरुदेव दद्दाजी का 55वां सवा करोड़ शिवलिंग निर्माण कार्यक्रम का समापन भी, तो इन सबके बीच आपके जन्मदिन की क्या खास तैयारी रही?

तारीख के हिसाब से हमारा जन्म 10 नवंबर को हुआ और तिथि के हिसाब से अक्षय नवमी को। इस वर्ष हमारे जन्मोत्सव की सबसे अदभुत बात ये रही कि दद्दाजी के सानिध्य में 55वां सवा करोड़ शिवलिंग निर्माण कार्यक्रम की शुरुआत 4 नवंबर से हुई, जोकि तिथि के हिसाब से हमारा जन्मदिवस है और कार्यक्रम का समापन 10 नवंबर को हुआ, जोकि तारीख के हिसाब से हमारा जन्मोत्सव है। यही नहीं हमारा जन्मस्थान भी गाडरवारा है और इस बार कार्यक्रम स्थल भी गाडरवारा ही है, तो मुझे लगता है कि मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है कि यज्ञ की शुरुआत 4 नवंबर यानी अक्षय नवमी को हुई, उसका समापन 10 नवंबर को हुआ, हमारे जन्मस्थान से और हमारे ही पूज्यनीय गुरुदेव के सानिध्य में, तो मुझे लगता है कि ऐसा संयोग सदियों में ही बनता है। ये सुखद सौभाग्य वर्षों में आता है और अब पता नहीं कब ये संयोग बने।

अब हिंदी फिल्मों में भी अंग्रेजी भाषा धड़ल्ले से बोली जा रही है, इस तरह हिंदी की अनदेखी करने को क्या माना जाए, क्या अब कलाकार, जो साक्षात्कार देते वक्त तो हिंदी बोलने से कतराते हैं, फिल्मों में भी हिंदी बोलने से बच रहे हैं?

देखिए मेरे लिए भाषा कभी भी विवाद का विषय नहीं रही, भाषा मेरे लिए हमेशा संवाद का विषय रही है। मेरा ये मानना है कि ये बहुत अच्छी बात है कि आप हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं को सम्मान दें, लेकिन दूसरी भाषाओं को सम्मान देने का मतलब ये नहीं होता कि हम स्वयं की भाषा का अपमान करने लगें। ये हमारी भारतीय संस्कृति है कि हम पड़ोसी की मां को भी अपनी मां का दर्जा देते हैं, तो फिर अपनी मां को उस सम्मान से वंचित न होने दें। हम हमेशा से इसको मानते रहे हैं कि हिंदी हमारे सपनों की भाषा है, हिंदी हमारे अपनों की भाषा है, हिंदी राष्ट्र की भाषा है, हिंदी हमारे व्यवसाय की भाषा है। तो हिंदी हमारी आवश्यकता भी है, हिंदी हमारा संस्कार भी है, संस्कृति भी है और हिंदी हमारी मजबूरी भी है। इसलिए इस भाषा को हमेशा ही परिष्कृत होना चाहिए, लेकिन ये एक ग्लोबलाइजेशन का दौर चल रहा है कि विश्व भाषा को जब हम और आप भाषा का दर्जा देने लगे हैं, तो मुझे लगता है कि वही व्यक्ति विश्व में सफल हो सकता है, जो अपने देश में सफल रहा है। वही व्यक्ति दूसरी भाषा को सम्मान दे सकता है, जो स्वयं की मातृभाषा को सम्मान देता हो। हम इस विषय में बिल्कुल ही इतर सोचते हैं।

आप शुद्ध हिंदीभाषी है, सैट पर या दूसरे कलाकारों के बीच कोई असहजता तो नहीं होती?

मेरा ये मानना है कि अगर आप अंग्रेजी में सहज हैं, तो आप अपनी सहजता का इस्तेमाल करें प्रश्न पूछने में, और मैं हिंदी में सहज हूं, तो मैं अपनी सहजता का इस्तेमाल करूंगा, जवाब देने में। हां, अंग्रेजी हम उन लोगों के लिए सुरक्षित रखे हुए हैं, जो हिंदी जानते ही नहीं हैं। मेरा ये मानना है कि यदि भोपाल के किसी व्यक्ति को चैन्नई जाना है, तो मैं वाया लंदन जाने के या वाया वॉशिंगटन जाने के सीधे चैन्नई जाना पसंद करूंगा। मुझे अगर अपने परिवार से, अपने भाई, आपसे या हिंदी जानने वाले से संवाद स्थापित करना है, तो मैं अपने मित्र की भाषा का प्रयोग नहीं करूंगा। दो लोगों का मिलना या मिलने के बाद आनंद आना सहजता पर निर्भर करता है। तो हमें सहज आनंद की प्राप्ति नहीं होगी, हमारी जो भी मुलाकात होगी, वो एक असहजता धारण कर लेगी।

क्या आप कभी राजनीति की तरफ रुख करना चाहेंगे, जैसाकि देखा जा रहा है कि इंडस्ट्री में जाने-माने कलाकार एक समय बाद राजनीति में उतर आते हैं।

हमारा ऐसा कोई विचार कभी नहीं रहा। हम छात्र राजनीति छोड़कर फिल्मों में आए। अगर आप हमारे अतीत को जानेंगे, तो हम पहले सागर विश्वविद्यालय के नेता हुआ करते थे, राजनीति के सक्रिय विद्यार्थी हुआ करते थे। सक्रियता को तिलांजलि देते हुए हमने अभिनय क्षेत्र को अपनाया, अभिनय हमारा पेशा है और राजनीति हर नागरिक का नैतिक दायित्व है। हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह राजनैतिक तौर पर जागरूक रहे। मगर लोग इसका गलत अर्थ लगा लेते हैं। अगर आप राजनैतिक रूप से जागरूक हैं, तो इसका मतलब ये नहीं है कि अब आपका रास्ता संसद की तरफ मुड़ता है। राजनेता और अभिनेता में बहुत सारी समानताएं होती हैं दोनों ही पब्लिक का मन बदल सकते हैं। राजनेता के हस्ताक्षर को अथॉरिटी कहते हैं और अभिनेता का हस्ताक्षर ऑटोग्राफ कहलाता है। बस यही अंतर है, इसके अलावा इसमें मुझे कोई अंतर नजर नहीं आता। राजनेता और अभिनेता दोनों ही लोगों के मन का रंजन करते हैं। राजनेता लोगों की लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करके उनकी समस्याओं का समाधान करके आनंद देता है। जिस भी नेता ने जनता के या अभिनेता ने दर्शकों के मन को आनंद किया है, वह अपने क्षेत्र में सफल रहे हैं।

मप्र सरकार बेटी बचाओ अभियान चला रही है, अब जब बेटियों की संख्या न के बराबर रह गई, तो क्या इस कदम को पहले नहीं उठाना चाहिए था? क्या कहना चाहेंगे आप इस बारे में?

महाराष्ट्र में एक कहावत चलती है कि मूल की शिकली प्रगति झाली। हमारा यह मानना है कि पुरुष मूल की शिकली यानी महिलाएं अगर सीख गईं, तो प्रगति हो गई। इसके पीछे हमारा कहना ये है कि पुरुष एक महाविद्यालय के जैसा है, तो महिला एक विश्वविद्यालय के जैसी होती है। पुरुष की प्रगति एकाकी प्रगति होती है, लेकिन महिला की प्रगति सामूहिक प्रगति होती है। निश्चित रूप से वह एक आधार स्तंभ है। बेटी बचाओ के पीछे उसके जन्म की बात नहीं है, कहीं न कहीं जीवन की बात है, परमार्थ की बात नहीं है बड़े स्वार्थ की बात है कि हम अपनी मां जिनके गर्भ से हम जन्म लेते हैं या मां हमें संस्कार देती है पिता भले ही शिक्षा दे दे, लेकिन संस्कार मां ही देती है। ऐसी शिक्षा का कोई महत्व नहीं होता, जिसके अंदर संस्कार न हो। ऐसे अशिक्षित व्यक्ति को आप हमेशा पसंद करेंगे, जिसके अंदर संस्कार हों। शिक्षा के ऊपर तरजीह दी गई है, वरीयता दी गई है। यह बहुत बड़ा और आदरणीय अभियान है। ये बेटी जन्म की बात नहीं है, ये मानवीय संस्कृति, मानवीय विकास की बात है कि यदि आप एक महिला को संभाल लेंगे, तो वह दस अशिक्षित पुरुषों को संभाल सकती है। कहने का तात्पर्य ये है कि ये बहुत अच्छा अभियान है और इसे व्यक्तिगत रूप से समर्थन देने के लिए सभी को आगे आना चाहिए।

आपकी पत्नी रेणुका निर्देशन के क्षेत्र में उतर चुकी हैं, और उनकी पहली निर्देशित फिल्म रीटा बहुत चर्चा में है। पत्नी रेणुका और निर्देशक रेणुका में क्या अंतर देखा?

पिछले वर्ष रिलीज हुई रीटा को कई सारे अवॉर्ड मिल चुके हैं। दूसरी फिल्म के ऊपर वो काम कर रही हैं, जोकि हिंदी फिल्म होगी और हिंदी में मैं निश्चित रूप से काम करूंगा। रेणुकाजी की सबसे बड़ी बात ये है कि वो जितनी अच्छी अभिनेत्री हैं, उतनी ही अच्छी निर्देशक हैं और उतनी ही अच्छी लेखक भी हैं। हम दोनों ही अपने बाजार को परिवार में नहीं लाते और परिवार को बाजार में नहीं ले जाते। जिस वजह से परिवार भी आनंददायी स्थिति में रहता है और बाजार भी गरिमापूर्ण बना रहता है। वो उनका पेशा है, उनकी प्रवृत्ति है, वो उनकी संस्कृति है। एक कहीं न कहीं बाजार से संबंधित है, तो एक कहीं न कहीं परिवार से संबंधित है। तालमेल बैठा Êिांदगी जीने का उनका तरीका सराहनीय है।

आपने महेश भट्ट साहब के पैर छुए, तो उन्होंने आपको सैट से बाहर निकाल दिया, अब जबकि आप इंडस्ट्री में एक सीनियर पोजीशन पर हैं, कोई आपके पैर छूता है, तो आपका रिस्पॉन्स कैसा होता है?

कुछ नहीं ये तो हमारी आदत ही रही है छोटे थे, तो बड़ों के पैर पड़ते थे। जो हमसे छोटे थे, वे हमारे पैर पड़ते थे। यह इतनी अचंभित कर देने वाली बात नहीं रही। पैर छूना, बड़ों का आदर करना है, यह संस्कृति के साथ-साथ हमारे संस्कार भी हैं। और यदि कोई व्यक्ति आपसे मिलते हुए अपने संस्कारों का अनुसरण कर रहा है, तो आपको भी उसका अनुसरण करना चाहिए। आप उसके लिए अपने संस्कार मत बदलिए, वो हमारे मिलने का तरीका है। पैर पड़ना या न पड़ना ये जरूरी नहीं है कि आप किसी का सम्मान कर रहे हैं या न पड़कर भी आप किसी का अपमान कर रहे हैं। वो हमारे संस्कार हैं।

झलक दिख ला जा में आपकी पत्नी ने पार्टिसिपेट किया था, क्या आप बिग बॉस जैसे किसी रिएलिटी शो का हिस्सा बनने की तैयारी में हैं?

हालांकि ऐसे ऑफर मुझे हर वर्ष मिलते हैं, लेकिन मैं अक्सर उन ऑफर्स को दरकिनार कर देता हूं। बतौर पार्टिसिपेंट मैं अपने आपको कहीं नहीं देख पाता। मैंने कुछ शोÊा को प्रस्तुत जरूर किया है, जैसे सरकार की दुनिया, बाजी, लेकिन मैं बतौर प्रतिभागी किसी कार्यक्रम के लिए खुद को सहज नहीं पाता। मैं ऐसे किसी भी रिएलिटी शो में जाना ही नहीं चाहता। हर व्यक्ति के अपने मूल होते हैं। मेरा दायित्व सिर्फ इतना होता है कि चूंकि मैं सहज नहीं हूं, इसलिए मैं उन्हें दरकिनार कर दूं।

वो कौन-सा आशुतोष राणा जो अब तक मीडिया से छुपा हुआ है?

वो आशुतोष राणा हमेशा छुपा रहेगा, क्योंकि वह मेरे परिवार का हिस्सा है। और मेरा ये मानना है कि मेरी पत्नी-पुत्र, मेरे पिता को या मेरे भाई को, परिवार या मित्रों को ये गौरव मिलना चाहिए कि कुछ ऐसे पक्ष हैं आशुतोष के जिसे सिर्फ वो जानते हैं। जिस पर उनका विशेषाधिकार है, मैं उसका हनन नहीं करना चाहूंगा।

एक सफल कलाकार बनने के लिए क्या दृष्टिकोण होना चाहिए, क्या तैयारी होनी चाहिए?

देखिए, इच्छा और क्षमता दो अलग-अलग चीजें होती हैं। हमसे ये भूल हो जाती है कि हम अपनी इच्छाओं को क्षमता मानने लगते हैं अगर आपकी इच्छा है, तो इच्छा की पूर्ति के लिए क्षमता बढ़ाइए। आपकी जो क्षमता है, उसको इच्छा बना लीजिए। जब क्षमता और इच्छा एक हो जाएगी, तो दुख नहीं होगा, असफलताएं नहीं होगी। इच्छा को क्षमता मानने की गलती न करें। क्षमता अनुरूप काम करें, या इच्छाअनुकूल क्षमता बढ़ा लें। हमारा यही मानना है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि अवसर छोटे-बड़े नहीं होते, अवसर, अवसर होते हैं। और याद रखें आपकी तैयारी और अवसर जिस पल आपस में मिलते हैं, वहीं से भाग्योदय होता है। आपके हाथ में तैयारी है, अवसर जब भी तैयारी से टकराएगा, उससे जो स्पार्क निकलेगा, वह भाग्य कहलाएगा। जो व्यक्ति तैयार होता है, उसे समय-समय पर अवसर नजर आते हैं। भाग्य के भरोसे आपको अवसर मिल जरूर सकते हैं, लेकिन उन अवसरों का सदुपयोग तभी आप कर सकते हैं जब आपकी तैयारी हो। तैयारी का उतना ही महत्व है जितना भाग्य है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। भाग्यअनुसार मिले हुए अवसरों का सदुपयोग करना चाहते हैं, तो जितनी आपकी तैयारी होगी, उसका दस गुना आपको प्रतिफल मिल जाएगा, यही भाग्य का चमत्कार है।