1993 में एक अंग्रेजी पत्रिका के साथ, अपने पत्रकारिता कॅरियर की शुरुआत करने वाले सतीश के. सिंह ने कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है। अंग्रेजी पत्रिका में कुछ समय काम करने के बाद वे नलिनी सिंह के प्रोजेक्ट ‘हेलो जिंदगी’ के साथ जुड़ गए, फिर डीडी न्यूज़ में कुछ दिनों तक काम किया और 1996 में ‘ज़ी न्यूज़’ के साथ जुड़ गए, जहां पर वे 2005 तक रहे। उसके बाद वे, ‘एनडीटीवी’ में 2007 तक बतौर सीनियर आउटपुट, एडिटर जुड़े रहे। इन्होंने फिर से 2007 में ‘ज़ी न्यूज’ में बतौर एडिटर एंट्री की।
‘ज़ी ग्रुप’ इंडिया का पहला ग्रुप है, जिसने देश में पहला 24 घंटा प्राइवेट टीवी चैनल और 24 घंटा प्राइवेट न्यूज़ चैनल शुरू किया और आज देखा जाए तो टीआरपी में ‘ज़ी न्यूज़’ टॉप थ्री में दिखाई नहीं देता। इसमें कहां कमी रही जाती है?
इसकी कई वजह है। देखो आज के समय में, लोग न्यूज़ के नाम पर मनोरंजन कर रहे हैं। लोग ड्रामा करते हैं। देखा जाए तो ख़बर का रेप हो रहा है। वैसा हम ना करते है और न ही करना चाहते हैं। सारे स्टडी यही दिखाते हैं कि अधिकतर चैनलों पर पच्चीस से चालीस प्रतिशत तक भूत, पिसाच और मनोरंजन का कंटेंट देखने को मिलता है। तो देश में दो तरह के दर्शक हैं, एक अनपढ़ मास है और दूसरा शिक्षित मास है। तो वो लोग कम पढ़े लिखे लोगों को ऐसी चीजें परोस कर उनके साथ धोखा कर रहे हैं। हम लोग वैसा काम नहीं करते, हम लोग सीधा न्यूज़ की तरफ जाते हैं। इंफॉरमेशन और इंपावरमेंट की तरफ जा रहे हैं। जो लोगों से जुड़ी ख़बर है, उनकी तरफ हमारा रुझान है, एक कारण तो यह है। दूसरा यह है कि जो न्यूज़ देखने वाली कैटेगरी है, उसमें हमारी पहचान बन चुकी है। और हमें रिसपॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। ओबामा के भारत यात्रा के समय हम लोग दूसरे नंबर पर थे। हम न्यूज़ चैनल के तौर पर, बिना अपने कंटेंट से भटके, अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए, अपने वादे को पूरा कर रहे हैं। तीसरी वजह यह है कि हमारे पास जितना है, हम उतने में ही खुश हैं। हम टॉप पर पहुंचना चाहते हैं, लेकिन न्यूज़ के माध्यम से। यह कोई मतलब नहीं बनता कि प्राइम टाइम में ‘सारा और अली की शादी’ या पामेला पहुंची ‘बिग बॉस’चला दो। हम ऐसा नहीं करते। हम अपनी विश्वसनीयता को कंटेंट से कोई समझौता किए बिना बरकरार रखेंगे। एक, हम पे चैनल भी हैं, इससे भी फर्क पड़ता है। लेकिन जब भी कोई बड़ी खबर है, चाहे वो ‘कोई भ्रष्टाचार की’ या ‘ओबामा की भारत यात्रा’ हो तो हमें इसके दौरान देखा जाता है। और हमें नंबर भी मिलते हैं, फीडबैक भी अच्छी आती है।
जब कोई बड़ी ख़बर आती है, जिसमें आप चाहते हैं कि दर्शक भी देखे और टीआरपी भी बनी रहे और मनोरंजन भी हो, तो आप इसे कैसे बैलेंस करते हैं? देखिए कोई भी ख़बर, तभी ख़बर हो सकती है, जब उसका कोई न्यूज वैल्यू हो। जबरन आप उसमें कुछ उल्टा-पुल्टा करके ख़बर नहीं बना सकते। आप कोई पक्षपात नहीं करेंगे, आप ख़बर के सारे पक्ष सामने रखेंगे। आप न्यूज़ दिखाएंगे ,न्यूज़ एंटरटेनमेंट नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि वो ख़बर कितनी जनता से जुड़ी है। वो लोगों के हित से कितनी जुड़ी हुई है, तभी वो ख़बर हो सकती है। हमारा काम है, संबंधित ख़बर को अपने दर्शकों को इंफॉर्म और इंपावरमेंट करना। किसी का मनोरंजन करना, हमारा काम नहीं है। हम मीडिया प्लेटफॉर्म है, हमें अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए।
जनता के हित की बात करें, तो न्यूज़ चैनलों पर रियलटी शो की खबरें, पांच से छह घंटे लगातार दिखाई जाती है, तो उसमें कहां जनता का हित जुड़ा है, इस पर आपकी क्या राय है ?
ऐसा करना, हमारे यहां पर सख्ती से मना है। लोग इसे पांच से छह घंटे दिखाते है, इसे हम ज्यादा से ज्यादा, एक से डेढ़ मिनट तक ही दिखाते हैं। मुझे नहीं लगता कि इसमें जनता का हित है। वो लोग ख़बरों का रेप कर रहे हैं। वो ख़बर के नाम पर कलंक है। वे अपनी पावर का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। अपनी जिम्मेदारी को न समझते हुए वे लोग मीडिया की विश्वसनीयता को खो रहे हैं। हम कोई फिल्म अभिनेता नहीं है कि हम लोगों का मनोरंजन करें। हम, हमारे देश और समाज के अभिनेता हैं। हमारी अपनी जवाबदेही है। अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उन लोगों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे सामाजिक गतिविधियों, नैतिक गतिविधियों के प्रति जवाबदेह हैं की नहीं। हमे लाइसेंस मिल गया, तो इसका मतलब यह नहीं कि हम ख़बरों का दुरुपयोग करें। हम उस प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल करें। हम जो सोचते हैं, हमारी जो मर्जी है, वो हम करें। अगर ऐसा है तो वो मीडिया नहीं, वो कोई न्यूज़ चैनल नहीं। आपको एक चीज समझना होगा कि आप समाज और देश का न्यूज़ चैनल हैं। आपको देखना होगा कि समाज में किस तरह की दिक्कतें हैं? उससे कैसे निजात मिल सकती है? कैसे मुद्दें समाज में है? इन्हें हमें कितना हाइलाइट करना चाहिए या नहीं? हमें लोगों की आवाज को सरकार तक पहुंचाना है, ना कि मनोरंजन करना है। दूसरा, हमें लोकतंत्र में वाचडॉग का काम करना है। जब आप अपने आप को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहते हैं, तो वो जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। आप मनोरंजन दिखा रहे हैं तो लोग आपको देख रहे हैं। कहां आप वाचडॉग की भूमिका निभा रहे हैं?
लेकिन देखा जाए तो ऐसे शो की टीआरपी भी अच्छी रहती है और लोग इन्हे पसंद भी करते हैं इसके पीछे क्या वजह है ?
इसकी एक वजह है कि आप लोगों को च्वाइस ही नहीं देंगे और विभिन्न उल्टी-पुल्टी चीजें दिखाएंगे तो क्या होगा। तो वो शो देखे ही जायेंगे। लेकिन लोग, काम की न्यूज़ भी देखते हैं। बहुत सारे न्यूज़ ईवेंटस में और अच्छी ख़बरों में ये साबित भी हो चुका है। दूसरे, जनता धीरे-धीरे सजग और जागरूक हो रही है। वो दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी और कर रही है। इस तरह की गलत चीजें दिखाने पर बहुत सारे न्यूज़ चैनलों की थूक्का फजीहत हो चुकी है और हो रही है। मीडिया की थूक्का फजीहत हो रही है। इसके लिए वे लोग ही जिम्मेदार होंगे। हम लोग तो अपना काम कर रहे हैं। हमने बोर्ड एक्सपेरिमेंट किया था, जिसमें हमारे ग्रुप के चैयरमेन, सुभाष चंद्रा और ग्रुप के सीईओ, वरुण दास मौजूद थे। उन्होंने हमें सुझाव दिया कि हमें ख़बरों से नहीं हटना है। हम केवल ख़बरों पर ही बने रहना है। साथ ही उन्होंने बताया कि आप अपनी भूमिका को समझिए बाकि चीजों की आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। हम उन्ही पॉलिसी पर काम कर हैं। हमारे एडिटोरियल पर कोई दबाव नहीं है। लेकिन कई भी भूले से कोई छोटी सी गलती हो जाती है, तो हमें बहुत डांट पड़ती है। लेकिन हमारे काम में कोई हस्तक्षेप नहीं है। हमें तो केवल यहीं कहा जाता है कि आप केवल परिपक्वता दिखाइये। अपनी जिम्मेदारी को निभाओ। अपनी भूमिका का निर्वाह करो। आप केवल ऐसी स्टोरी करो, जो समाज और देश को बनाती हो, जनता को सजग और जागरूक करती हो। उनका कहना है कि आप निर्माण करिये विनाश नहीं। लोगों को डराइये मत, लोगों में भ्रम मत फैलाइये।
न्यूज़ चैनलों में एक और ट्रेंड आया है वो है फास्ट न्यूज़ का। कोई पांच मिनट में पचास ख़बरें दिखाता है, तो कोई पंद्रह मिनट में 100 ख़बरें दिखाता है, तो ये कहां तक सही है? क्या ऐसा होना चाहिए?
देखिए ख़बरों का कोई अंकगणित नहीं है। ये मानना तो है कि लोगों के पास समय नहीं है, लेकिन जब तक आप ख़बरों के विभिन्न आयाम और तथ्यों को नहीं दिखाओगे और ख़बर की तह तक नहीं जाओगे, तो ख़बर में ना तो सरलता होगी और ना ही दर्शक उसे समझ सकेंगे। हम केवल इंफोर्मर बनकर रह जाएंगे। आपका काम है, ख़बर की तह तक जाना, उसके सभी पक्ष बताना, लोगो का मत जानना। ये सारी चीजें हो, तब जाकर ख़बर बनती है। ख़बर की क्या प्रासंगिकता है? इसके कितने आयाम है? कितना महत्व है? कितनी अहम है? यह लोगों को कैसे प्रभावित करती है? इन सारी चीजों को बताना पड़ता है। यह नहीं की समय नहीं है, तो हवा मारकर चल देंगे। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि हम मनोरंजन की ख़बर तो पांच घंटे चलाए और खबर दिखायें, पांच मिनट में पचास। ये कहां का मतलब बनता है? वैसे ‘ज़ी’ ही इसका संस्थापक है, सबसे पहले ‘ज़ी’ ने ही इसकी शुरुआत की थी, लेकिन ‘ज़ी’ केवल एक ही बुलेटिन करता है। जब हेडलाइन चलती रहती है और थोड़ी बहुत न्यूज़ ब्रीफ भी होती है, तो इसमें कहां स्पीड न्यूज़ की जरूरत है। अगर भ्रष्टाचार की कोई बड़ी ख़बर है, ओबामा भारत आ रहा है, यहां बजट के समय, क्या हम पांच मिनट में पचास ख़बरें चलायेंगे। ये निंदनीय है। यहां ख़बरों का बलात्कार हो रहा है। लोग अपनी भूमिका से हट रहे हैं। आप अपनी विश्वसनीयता को खो रहे हैं। जो ख़बर आपके लाइफ, शिक्षा, रोजगार, समाज, सरकार और राजनीति को प्रभावित करती है, वही ख़बर है।
क्या न्यूज़ चैनल, पहले की अपेक्षा कुछ परिपक्व हुए हैं?
देखिए न्यूज़ चैनलों में परिपक्वता अयोध्या फैसले में देखने को मिली। यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी। न्यूज़ चैनलों का काम आग लगाने का नहीं, आग मिटाने का है। संयम बरतने का, सदभाव पैदा करने का है। और न्यूज़ चैनलों ने इस तरह से काम किया भी। इस कदम को लोगों ने सराहा भी और तारीफ भी की। मेरा तो यही कहना है कि आप ऐसे तत्वों को तवज्जों ही मत दीजिए जो अराजकता फैलाते हैं, उन्हें अपना गलत उपयोग मत करने दो। जो संकुचित सोच वाले या दकियानूसी सोच के लोग है, उन्हें आपको प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। ऐसे लोगों को तवज्जो देनी चाहिए, जो समस्याओं का समाधान बताता हो। जो सब लोगों को साथ रखे, जो सारी चीजों को मिलाता हो। वैसे देखें तो 1992 में मीडिया में अतिश्योक्ति हुई, इसका नुकसान भी हुआ और लोगों को उठाना भी पड़ा। मेरा मानना है कि अगर कोई आतंकवादी हड़ताल करता है, चाहे वो आतंकवादी कोई भी हो, चाहे अजमेर की दरगाह पर धमाका का आरोपी हो या कोई और हमला करने वाला हो, उसे तवज्जो ही मत दो। ऐसी जगहों पर सुरक्षा की बात करनी चाहिए। कहां सुरक्षा में कमी रह गई? कहां चूक रह गई? सब बात करो, लेकिन संकुचित सोच वाला या देश विरोधी भावना रखने वाले को तवज्जो ही नहीं देनी चाहिए। देश की समस्याओं का आधा समाधान तो यही है। ये लोग केवल पब्लिसिटी के लिए सब कुछ करते हैं। इनको आधार देना बंद कर दो, इनको प्लेटफॉर्म देना बंद कर दो, ये सब बंद हो जाएगा। वे लोग नाम से बदनाम होकर आपका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि उनको अपना गलत इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए।
‘बीईए’, ‘एनबीए’ और ‘एनबीएसए’ जैसी संस्थाओं के आने से टीवी न्यूज़ के कंटेंट में कैसा सुधार देखने का मिला है?
‘एनबीएसए’ का मैं भी मेंबर हूं। ऐसी संस्थाएं आने के बाद न्यूज़ चैनलों को एक गाइडलाइन, जांच पड़ताल, मोनिटरिंग और संयम जैसी सारी चीजों में मदद मिली है। इन संस्थाओं ने काम किया है, लेकिन अभी हमें बहुत दूर तक जाना है। ‘अयोध्या मामले’ में सबने मिलकर बहुत बड़ा काम किया है, इनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। इस मामले में लोगों को मीडिया ने शांत रहने, संयम बरतने में, काम किया है। लेकिन इनकी भूमिका धीरे-धीरे बढ़नी चाहिए। सरकार भी ऐसा मानती है। ‘बीईए’ के लोग आपस में संवाद करते हैं, वो लोग चर्चा करते हैं कि क्या करें, क्या नहीं करना चाहिए? सभी के क्या विचार हैं? लेकिन अभी बहुत कम काम हुआ है, इसमें बहुत सारा काम करने की जरूरत है। तमाम चैनलों और नेटवर्क को इसके अंतर्गत लाने की जरूरत है। सरकार भी इसे मानती है, सरकार खुद कहती है कि इसमें सेल्फ रेगुलेशन होना चाहिए। सरकार का कहना है कि आपके डीएनए में बदलाव और ट्रेनिंग में बदलाव की जरूरत है। आपका कोई बुनियादी आधार होना चाहिए। तभी जाकर सुधार होगा। इसमें और ज्यादा काम होने की जरूरत है। तमाम पूरे चैनलों और नेटवर्क को इसके अंदर लाने और जोड़ने की जरूरत है। यह नहीं कि, सरकार के हाथ में आए, सरकार खुद कहती है कि हां आप सेल्फ रेगुलेशन करें।
सरकार ने अभी टीवी चैनलों को मोनिटर करने के लिए बार्क संस्था बनाने का कहा है तो आपका क्या कहना है कि यह संस्था बननी चाहिए थी या सेल्फ रेगुलेशन होना चाहिए था।
सेल्फ रेगुलेशन का तो कोई जवाब ही नहीं है। पुलिसिंग करने से कोई काम नहीं होता। देश में तमाम तरह के कानून हैं, संस्थायें है, प्रेस काउंसिल है, पार्लियामेंट है या एनबीएसए जैसी संस्थाएं है, जहां जाकर टीवी न्यूज़ चैनलों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। यहां कानूनों की कमी नहीं है। अगर कोई पत्रकार, अख़बार या न्यूज़ चैनल कोई गलत काम कर रहे हैं, तो उनके खिलाफ कैंपेन चलाइये, उनकी शिकायत करिये। कोर्ट मे जाइए, उनके खिलाफ केस दर्ज कराइये। सरकार के पास अधिकार है कि वो चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दे, उनका प्रसारण रोक दे। केवल कमेटी बना देने से क्या होगा? ट्राई बनाई थी, ना उसका क्या हुआ, आप देख ही रहे हैं। सही परिस्थितियों का निर्माण संवाद को पैदान करना होगा। ‘एनबीए’ और ‘बीईए’ जैसी संस्थायें अच्छा काम करने का प्रयास कर रही हैं। अभी बहुत दूर जाने की जरूरत है। वैसे सारे चैनल शिकायत करने की, सूचना के टीकर चला ही रहे हैं, जिनको कोई शिकायत है, तो उसे शिकायत करनी चाहिए। इनका रिसपॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। इससे शिकायतें भी आ रही हैं और उनका समाधान भी किया जा रहा है।
आज के समय में रीजनल चैनल बहुत सारे हैं। ‘ज़ी’ के भी कई रीजनल चैनल हैं, तो क्या रीजनल चैनलों से, नेशनल चैनलों को किसी तरह का सहयोग मिलता है और इसका कैसा प्रभाव पड़ा है?
यह एक चर्चा का विषय है। इन दोनों को एक-दूसरे को बढ़ावा देना चाहिए। लेकिन दोनों प्रोडक्टों, रीजनल और नेशनल में विभिन्ता होनी चाहिए। भाषा की जो विभिन्नता है, उसे तो दूर नहीं किया जा सकता। लेकिन दोनों की तासिर थोड़ी अलग हो, तो अच्छा है। रीजनल चैनलों के आने से हिंदी न्यूज़ चैनलों पर असर तो पड़ा है। लेकिन यह चिंताजनक नहीं है। इसे बढ़ावा देना चाहिए। इससे पत्रकारिता की पहुंच और ज्यादा बढ़ती है। इसके जरिये हम गांव तक पहुंच रहे हैं। पहले हम शहर तक थे या यूं कहें तो संसद तक थे। फिर शहरों की सड़को पर पहुंचे, फिर राजधानियों की ओर। और आज जब लोग गांव से शहर की ओर अग्रसर हैं तो हम शहर से गांव की ओर पहुंच रहे हैं। पहले छोटे एरिया से खबर बनती भी नहीं थी, लेकिन वो आज के समय में नेशनल हेडलाइन हो जाती है। मेरा तो यही कहना है कि चाहे कंटेंट का मामला हो या किसी तरह का कोई मुद्दा, कवरेज में एक-दूसरे को बढ़ावा देना चाहिए। लेकिन थोड़ा फर्क जरूर होना चाहिए। ‘रीजनल’ अगर नेशनल मुद्दे और ‘नेशनल’ अगर लोकल मुद्दे उठाने लगे, तो अच्छा नहीं लगेगा।
हिंदी न्यूज चैनलों में पिछले सालों में कितना बदलाव आया है?
पिछले कुछ समय को देखें तो हिंदी न्यूज़ चैनलों में पुर्नउत्थान हुआ है। जो न्यूज़ चैनल, खबरों से दूर भागते थे, आज वो भी खबर दिखाने के लिए विवश हो रहे हैं। बीच में तीन-चार साल टीवी न्यूज़ में गलत जरूर हुआ है। लेकिन जो नॉन सीरियस प्लेयर हैं, उनको अपनी प्राइमेरी जॉब को नहीं भूलना चाहिए। अब देखें तो ‘टीवी’, ‘प्रिंट’ कोर की ओर अग्रसर हो रही है, चाहे वो कवरेज हो, मुद्दों को उठाना हो या लोगों का मत जानना हो। प्रिंट ने भी अपने आप को पुर्नउत्थान किया है। सारे अख़बारों ने सभी पेजों को कलर कर दिया है। सारे अख़बार अलग-अलग खबरें उठाने लगे। ‘टीवी’ भी ‘प्रिंट’ की जगह ले रहा है। मुझे लगता है ‘टीवी’ और ‘प्रिंट’ को एक-दूसरे को बढ़ावा देना चाहिए। न्यूज] चैनल बीच में रास्ते से भटक गए थे। जिसकी वजह से इन्होंने अपनी इज्जत भी खोई, इनकी बदनामी भी हुई। अब वो समय पीछे छूट गया है। मुझे लगता है प्रिंट और टीवी को एक दूसरे का सहयोगी होना चाहिए और होगा भी। इन्हें एक संयुक्त आवाज बननी चाहिए। अब टीवी वाले भी अच्छा काम कर रहे हैं। देखना यह होगा कि आप अपनी प्राइमरी जॉब ना भूलें, उसे सही ढ़ंग से करें। आप वह करते रहोगे, तो आपके लिए अच्छा रहेगा।
आपके लिए साल 2010 कैसा रहा और 2011 में क्या प्लान हैं?
साल 2010 पिछले साल की अपेक्षा, हमारे लिए अच्छा रहा। हम सही ट्रैक पर हैं। 2011 में हम जो काम कर रहे हैं, उसमें और ज्यादा वेराइटी और क्वालिटी लेकर आयेंगे। भाषा को सरल करेंगे, लोगों से जुड़ों मुद्दों को ज्यादा से ज्यादा उठायेंगे। अपनी विश्वसनीयता को और ज्यादा मजबूत बनाएंगे। हमारे कोशिश होगी कि हम इनोवेटिव प्रोग्रामिंग करें। थोड़ा लुक और फील भी बदलने की कोशिश करेंगे। हम ख़बरों की तह तक जाएंगे। 2011 में और भी ज्यादा अच्छा काम करने की कोशिश की जाएगी।


