क्या उनकी ऊर्जा का सार्थक इस्तेमाल कर पाएगी भाजपा
ना-ना करते आखिरकार उमा भारती की घर वापसी हो ही गयी। उमा भारती यानि भारतीय जनता पार्टी का वह चेहरा जिसने राममंदिर आंदोलन में एक आंच पैदा की और बाद के दिनों मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की 10 साल से चल रही सरकार को अपने तेवरों से न सिर्फ घेरा, वरन उनको सत्ता से बाहर कर भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाई। बावजूद इसके उमा भारती अगर भाजपा की देहरी पर एक लंबे समय से प्रतीक्षारत थीं, तो इसके मायने बहुत गंभीर हैं।
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58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा होती है और दबंग नाम की एक फिल्म को सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म का पुरस्कार मिलता है। आपको शायद इस पर खुशी हो पर मुझे चयन समिति की योग्यता पर शक़ होता है, पहली बार सुनने में तो ये मज़ाक सा लगता है लेकिन सामने एक टीवी समाचार चैनल इसकी पुष्टि कर रहा है। एक भ्रष्ट पुलिस वाले को दबंग बताती और सलमान खान की बेहूदी एक्टिंग से भरी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार, हमारी राष्ट्रीयता पर गर्व का नहीं विमर्श का मौका है। लेकिन कैसा विमर्श, ये वही देश है जहां आर्थिक अपराधी संत सिंह चटवाल और नीरा राडिया के ज़रिए राजा को घोटालेबाज़ बना डालने वाले रतन टाटा को पद्म पुरस्कार दे दिए जाते हैं, टाटा तो शायद अगर ये घोटाला न सामने आता तो भारत रत्न भी बन जाते।
ये वाकई समय है भयंकर विमर्श का कि क्या वाकई हम एक पॉपुलिस्ट संस्कृति वाले राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। एक ऐसा राज्य जहां देखा-देखी और केवल लोकप्रियता के आधार पर वो सब कुछ भी किया जाएगा जो नहीं होना चाहिए। क्योंकि किसी को तीन करोड़ लोग धर्म की अफ़ीम खा कर भगवान मानते हैं, जिसमें बड़े नेता, अभिनेता और क्रिकेटर शामिल हैं तो इसलिए उस पर लगे तमाम आरोपों को दरकिनार कर उसे भगवान मान लिया जाए। किसी के तमाम अपराधों को किनारे करते हुए केवल उसे अस्पताल और स्कूल खुलवाने के लिए समाजसेवक मान लिया जाए। दबंग दरअसल अपवाद नहीं है, हमारे सार्वजनिक जीवन के खोखले नायकों की ही तरह इस फिल्म में भी एक नायक है जिसकी एक फ़र्ज़ी रॉबिनहुडाई छवि बना दी जाती है गोया वो वाकई महान हो।
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नारद जयंती की पूर्व संध्या पर पत्रकारिता विवि में व्याख्यान
भोपाल,18 मई,2011। प्रख्यात कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल का कहना है हम अमंगल की खबरों से घिरे हुए हैं। यूं लगता है कि शुभ समाचार आने बंद हो गए हैं। ऐसे में हमारे समय की वाणी प्रदूषित हो गयी। हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल देवर्षि नारद जयंती की पूर्वसंध्या पर आयोजित व्याख्यान कार्यक्रम में मुख्यवक्ता की आसंदी से बोल रहे थे। व्याख्यान का विषय था ‘लोकमंगल संचारकर्ता नारद’। उन्होंने कहा कि शब्द ब्रम्ह हैं इसलिए हमें लोकमंगल की पत्रकारिता का विकास करना होगा। अगर हम लगातार अध्यात्मशून्य समाज बनाते जाएंगें तो हम कभी सफल नहीं हो सकते।
श्री शुक्ल ने कहा कि देवर्षि नारद ने हमेशा लोकमंगल के लिए अनवरत यात्राएं कीं। वे एक ऐसे यात्री हैं जो ईश्वर के मन को भाँप लेते हैं और ईश्वर पर अपना अधिकार समझते हैं। उन्होंने नारद को संदेशवाहक, संवादकर्ता ओर संचारकर्ता की भूमिका में देखने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि नारद दो बातों पर ज्यादा जोर देते थे कि पहला यथार्थ को निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए, और एक अच्छा श्रोता बना जाए। यही गुण एक पत्रकार का भी होना चाहिए।
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उन्हें पता है कि उनको मिली जिम्मेदारी साधारण नहीं है। वे एक ऐसे परिवार के मुखिया बनाए गए हैं जिसकी परंपरा में कुशाभाऊ ठाकरे जैसा असाधारण नायक है। मध्यप्रदेश भाजपा का संगठन साधारण नहीं है। उसकी संगठनात्मक परंपरा में ठाकरे और उनके बाद एक लंबी परंपरा है। प्यारेलाल खंडेलवाल, गोविंद सारंग, नारायण प्रसाद गुप्ता, कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, सुंदरलाल पटवा, लखीराम अग्रवाल, कैलाश नारायण सारंग सरीखे अनेक नाम हैं। बात मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा की हो रही है, जिन्हें इस महत्वपूर्ण प्रदेश के संगठन की कमान संभाले 8 मई,2011 को एक साल पूरे हो गए हैं। उनके बंगले और प्रदेश कार्यालय में दिन भर कार्यकर्ताओं का तांता लगा है। फूल, बुके, मालाएं और मिठाईयां, नारे और जयकारों के बीच भी उनकी नजर मछली की आंख पर है। वे कार्यकर्ताओं से घिरे हैं, उनकी शुभकामनाएं ले रहे हैं, उन्हें मिठाईयां खिला रहे हैं पर मंडीदीप नगरपालिका (भोपाल के पास का एक कस्बा) के चुनाव के लिए लगातार वहां के स्थानीय कार्यकर्ताओं से फोन पर बात कर रहे हैं। एक कार्यकर्ता हार पहनाने के लिए बढ़ते हैं तो प्रभात जी जुमला फेंकते हैं- “हार में नहीं जीत में भरोसा है मेरा।”
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अतः कुछ दिन पहले हमारी जनगणना के नतीजे सामने आये । और नतीजे बेहद ही निराष जनक थे । क्योकि उसमें हमारी लिंग अनुपात फिर कम हौ गया । हॉ एक और महिला का षिक्षा अनुपात बडा पर दूसरी तरफ एक से छः साल के बीच लिंग अनुपात 917/1000 हो गया । बेहद हि चिंता का विषय है ये क्या हो गया है हमारे समाज को क्यों वो वेटी को जन्म देना नही चाहते । पहले में सोचता था कि यह षिक्षा की कमी के कारण हो रहा है पर में गलत था बल्कि पढ़े लिखे समाज से और जटिल समास्या उभरी है । कन्या भू हत्या का मुख्य कारण षायद दहेज समझा जाता है । लोग सोचते है कि लड़की का जन्म होना मतलब एक परिवार या दहेज देने का बोझ पर यह दहेज प्रथा किसने चालू की हमने फिर उस फूल की कली का क्या दोष । सोचो अगर हमारे दादा दादी ने हमारी मॉ को आने से पहले ही गर्भ में मार दिया होता तो क्या हम आ पाते। इसका जबाव आपके पास है ।
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भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के आमरण अनशन रुपी शंखनाद के बाद दिल्ली के प्रीत विहार इलाके में एक विचार गोष्ठी में "भ्रष्टाचार का सामना कैसे करें" विषय पर चर्चा हुई.
"आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया " के महासचिव गोपाल प्रसाद ने कहा कि यूपीए सरकार अब तक की सबसे भ्रष्टतम सरकार है. वास्तव में सोनिया गाँधी ने संसद, प्रधानमंत्री को हाईजैक कर लिया है . राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC ) बनाकर अपनी महत्ता साबित करने तथा मंत्रीमंडल को पंगु करने के सिवा इसका कोई दूसरा काम नहीं है.जनता अब पहले के बनिस्पत जागरूक हो चुकी है. भ्रष्टाचार और कमरतोड़ मंहगाई ने जनता का जीना मुहाल कर रखा है. देश की जनता की पीड़ा अब असहनीय हो चुकी है और उसे अब हर हाल में बदलाव चाहिए .
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अच्छे काम में सौ अड़ंगे" वाली कहावत "अन्ना हजारे" के लोकपाल बिल में सत्य होती नजर आ रही है!
वैसे तो कभी इन नेताओ को विकास का नाम तक याद नहीं रहेगा क्योकि वास्तविक जीवन में इससे इनका कोई नता नहीं होता ये सब राजनैतिक जीवन की बातें होती है,लेकिन कोई अन्य किसी अच्छे कार्य के लिए कदम उठाये तो उसे पीछे हटाने की पूरी कोशिश करते है, और इस कम में सारे राजनैतिक प्रतिद्वंदी एक होते नजर आते है! इन सबकी यथार्थता के लिए हम नजर डालते है "अन्ना हजारे" के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किये गए अभियान की, जिसमे लोकपाल बिल की मंजूरी महत्वपूर्ण थी या ये कहा जाये की ये पूरा अभियान लोकपाल बिल को पास कराने के लिए ही था, जो भ्रष्टाचारियों के लिए एक "रूकावट" है!
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मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दरकते जनाधार को बचाना आसान नहीं
कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि उसे उसके कार्यकर्ता नहीं, नेता हराते हैं। पिछले दस सालों से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पस्तहाल पड़ी कांग्रेस के लिए भी यह टिप्पणी नाजायज नहीं है। लंबी खामोशी के बाद आखिरकार आलाकमान ने दोनों सूबों में नए प्रदेश अध्यक्षों को कमान दे दी है। मध्यप्रदेश में वरिष्ठ आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया और छत्तीसगढ़ में मप्र-छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में गृहमंत्री रहे वरिष्ठ विधायक नंदकुमार पटेल की ताजपोशी की गयी है। दोनों राज्यों में कांग्रेस का संगठन पस्तहाल है इसलिए दोनों प्रदेश अध्यक्षों के सामने चुनौतियां कमोबेश एक सरीखी ही हैं।
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बिखराव के चलते उपचुनावों में कांग्रेस की परंपरागत सीटें भी भाजपा को मिलीं
- संजय द्विवेदी
देश के पांच राज्यों की छः विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर लेकर आए हैं। मध्यप्रदेश, छ्त्तीसगढ़, झारखंड,गुजरात की पांच विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस ने कई राज्यों में मैदान उसके लिए छोड़ दिया है। यह एक संयोग ही है कि इन सभी राज्यों में भाजपा ही सत्तारूढ़ दल है। झारखंड की खरसांवा सीट की बात न करें, जहां राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खुद उम्मीदवार थे तो बाकी सीटों पर बड़े अंतर से भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस इन चुनावों में गहरे विभ्रम का शिकार थी जिसके चलते मध्यप्रदेश की दोनों सीटें कुक्षी और सोनकच्छ दोनों उसके हाथ से निकल गयीं। ये दोनों कांग्रेस की परंपरागत सीटें थीं,जहां कांग्रेस का लंबे अंतर से हारना एक बड़ा झटका है। मध्यप्रदेश की ये दोनों सीटें हारना दरअसल कांग्रेस के लिए एक ऐसे झटके की तरह है जिस पर उसे गंभीरता से विचार जरूर करना चाहिए।
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बिटियन की जो| . राजस्थान पत्रिका १२ फरवरी २०११ का सम्पादिकय पढ़ा . उप राष्ट्रपति की पत्नी श्री मति सलमा अंसारी यह कहना सनसनीखेज और अफ़सोस जनक ही नहीं एक तरफ़ा भी है जहा तक लड्कियों की सुरक्षा का सवाल है क्या स्वयं लड़किया जिमेदार नहीं ?
लड़कियों को जन्मते ही मार देने का सुझाव शायद लाडो सीरिए़ल के अम्माजी से प्रभावित है अन्यथा सलमा जी जिस समाज से सम्बंधित है उसमे बुरका के प्रावधान के पीछे भी बेटिओ , महिलाओ की सुरक्षा से ही जुडी हुई प्रथा हैं
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